अल्बर्ट आइंस्टीन का जीवन पहला भाग

आइंस्टाइन को बचपन में डिस्लेक्सिया नाम की एक बीमारी थी जिसके कारण से हुए सही से बोल नहीं पाते थे।  डिस्लेक्सिया वाले लोगों को बोलने में थोड़ी सी तकलीफ होती है। 

एक बार आइंस्टाइन और उनके साथ उनके परिवार खाना खाने के लिए बैठे, आइंस्टाइन के सामने उनकी मां ने एक ठंडा सूप रख दिया और आइंस्टाइन बहुत देर तक यूं ही बैठे रहे। उन्होंने सूप को हाथ तक नहीं लगाया तो जब सब लोग लगभग खा ही चुके थे तब आइंस्टाइन ने यह बोला कि यह बहुत ही ठंडा है।  उनकी मां ने एक सवाल किया कि यह बात उन्होंने पहले क्यों नहीं बताई तो उनका सिर्फ एक ही जवाब था कि उन्हें यह इस बात का पहले ख्याल ही नहीं आया कि उन्हें बोलने के लिए किन शब्दों का इस्तमाल करना है। आइंस्टाइन बताते है कि उनको बोलने से पहले, उनको बोलना क्या है? वह बोलते समय इतना खो जाते हैं कि उनको समझ नहीं पाते कि उनको आगे क्या कहना था। 

अपने बचपन से ही आइंस्टीन बहुत दृढ़ व्यक्ति थे उनको जो भी कार्य करते थे उसमें वह काफी खो जाते थे कि आस-पास क्या चल रहा है उनको इस बात का अंदाजा भी नहीं रहता था।  बचपन में बहुत बड़े ताश के पत्तों के पहाड़ बनाया करते थे, ताश के पत्तों से पहाड़ बनाने का शौक था वह घंटों ताश के पत्तों से महल बनाने में लगाते और यदि हवा चलने के कारण उनका 5 फीट लंबा ताश का महल पत्तों के ढेर बन जाता था तब वह वापस उसको बनाने में समय लगाते थे। उनके अंदर किसी भी चीज पर लंबे समय तक काम करने की पहले से ही क्षमता थी और यह आदत महत्वपूर्ण है कि आप एक चीज पर लंबे समय तक बिना रुके काम करते हैं। 

वही जब आइंस्टाइन 5 साल के थे तब आइंस्टाइन को उनके पिता ने एक कंपस दिया था उस कंपास ने आइंस्टाइन की दुनिया को चकाचौंध कर दिया था।  आइंस्टीन समझ नहीं पाते थे कि कैसे कंपस काम करता है और यह ही उनकी असली जिज्ञासा की शुरुआत हुई जब आइंस्टाइन ने उस कंपस को और समझना शुरू किया और कौन से वह तरंगे जो उस अदृश्य शक्ति का कारण बनती है और वह आइंस्टाइन को जीवन भर इस पर खोज करने के लिए प्रेरित करने वाली थी। 

आइंस्टीन जब 12 साल के थे तब तक उन्होंने मैथ्स और फिजिक्स पर महारत हासिल कर ली थी क्योंकि आइंस्टाइन को दूसरों से बोलने में भी काफी तकलीफ होती थी इस कारण से उन्होंने अपनी एक अलग दुनिया भी बना ली थी वह घंटों फिजिक्स की किताब और मैथ्स के सवालों को हल करने के पीछे लगे रहते थे।  अगर आप इंटरनेट पर देखना चाहेंगे तो आपको आइंस्टाइन की शुरुआती रिपोर्ट कार्ड भी दिखेगा और आपको यह मालूम चलेगा कि आइंस्टाइन अलजेब्रा और जमेट्री के सब्जेक्ट छोड़कर सभी क्षेत्र में बहुत भारी तरह से फेल हुए थे।  

आइंस्टाइन के जो ट्यूटर थे उन्होंने आइंस्टाइन को एक यूक्लिड ज्योमेट्री की किताब पढ़ने के लिए भी दी थी और कुछ समय के बाद आइंस्टाइन ने उस किताब को पूरा कर दिया वह भी बिना उनके सहायता के।  

वह जब 13 साल के थे तब वह ऐसी फिलॉस्फी के ऑथर्स को पढ़ रहे थे जो आम इंसान को कभी स्पष्ट नहीं होती थी, परंतु आइंस्टाइन फिलॉस्फी के सब्जेक्ट पर महारत हासिल कर ली थी और साथ ही साथ उन्होंने म्यूजिक जैसे क्षेत्र में भी अपने हाथ आगे बढ़ाने लगे थे। आइंस्टाइन इंटरव्यू में गया कि यदि वह साइंटिस्ट के तौर पर सफल ना हो पाते तो वह जवाब देते है की यदि मैं फिजिसिस्ट ना बन पाता तो मैं एक वायलिनिस्ट होता। 

आइंस्टाइन को वायलिन बजाना बहुत पसंद था वह कहते है जब मैं फिजिक्स के ख्यालों से मन में होते थे तब भी वह वायलिन बजाना पसंद करते थे।  आइंस्टाइन को स्कूल से सख्त नफरत थी वह कहते थे जितना भी मजा पढ़ने से आता है वह स्कूली शिक्षा के तरीकों से रुक जाता था और शिक्षा का सिर्फ एक ही तरीका स्कूल में है और वह रट्टा मार कर परीक्षा देना। 

अल्बर्ट आइंस्टाइन को कोई भी टीचर पसंद नहीं करते थे उनका दिन कक्षा में अपने ख्यालों में ही बीतता था इस कारण से जब आइंस्टाइन को कोई सवाल पूछा भी जाता था तो वह बताने में सक्षम रहते थे।  उनका यह बात बहुत फेमस है कि यदि आप एक मछली को उसके पेड़ पर चढ़ने की क्षमता से नापोगे तो वह हमेशा अपनी जिंदगी अपने आप को बेवकूफ समझ कर बिता देगी।  

जब आइंस्टाइन 15 वर्ष के थे तो उनके पिता का बिजनेस बहुत अच्छा नहीं चल रहा था और उनके बिजनेस में उन्होंने एक डील भी गवा दी थी।  इस कारण से उन्हें अपना बिजनेस बंद करना पड़ा और उन्हें अपना शहर छोड़कर दूसरे जगह नौकरी की तलाश में जाना पढ़ा। आइंस्टाइन को अपनी स्कूली शिक्षा को पूरा करने के लिए अभी वही रहना था तो आइंस्टाइन को पूरा परिवार अकेला छोड़कर दूसरे शहर चला गया। 

 आइंस्टाइन के पिता चाहते थे कि वह आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिक्स में डिग्री हासिल करें और उनके व्यापार को आगे संभाले पर आइंस्टाइन स्कूल से इतने तंग आ चुके थे कि उन्होंने अपने स्कूल को छोड़कर अपने परिवार के पास आने का फैसला लिया। एकाएक आइंस्टाइन को अपने दरवाजे देखकर उनके माता-पिता बिल्कुल अकेले रह गए थे क्योंकि आइंस्टाइन का अभी तो हाई स्कूल भी नहीं खत्म हुआ था और आइंस्टाइन उनके दरवाजे आ गए स्कूल के ड्रॉपआउट बन गए थे और जिस कारण से आइंस्टाइन का भविष्य भी अब उनको उनके माता-पिता को अब खतरे में लग रहा था।

अल्बर्ट आइंस्टीन का जीवन [ दूसरा भाग ]

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