अल्बर्ट आइंस्टीन का जीवन दूसरा भाग

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

आइंस्टीन जब अपने माता-पिता के पास वापस आए तो उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई की शिक्षा छोड़ दी थी, और इस कारण से वह नौकरी पाने में भी असमर्थ हो रहे थे। 

 आइंस्टीन ने इसी दौरान एक पॉलिटेक्निक का परीक्षा दिया जिसमें फिजिक्स ऑफ मैथमेटिक्स में यूनिवर्सिटी के सबसे ज्यादा अंख  हासिल किया और केमिस्ट्री बायोलॉजी जैसे विषय में फेल हो गए। उनके इतने अच्छे अंको को देखकर आइंस्टाइन को यूनिवर्सिटी में दाखिला देने के लिए एक शर्त रखी कि सबसे पहले वह जाकर अपनी स्कूली शिक्षा को पूर्ण करेंगे और तब यूनिवर्सिटी में आकर पढ़ सकेंगे। 

आइंस्टीन अपनी स्कूली शिक्षा को पूर्ण कर पॉलिटेक्निक में अपनी आगे की पढाई शुरू कर दी और अपने फिजिक्स की डिग्री पाने के लिए कक्षा में भी जाने लगे। परंतु आइंस्टीन को कभी भी कक्षा में  बैठकर पढ़ना अच्छा नहीं लगता था।  वह हमेशा  अपने शिक्षकों से प्रश्न पूछ कर उनको उनकी ही विषय में परेशान करते थे और साथ ही अपने शिक्षकों के बातों को भी वे नहीं मानते थे।  आइंस्टीन बहुत सारी कक्षा छोड़  दिया करते थे और कभी भी अपने शिक्षक द्वारा दिए गए कार्य को पूरा नहीं करते थे, इस कारण से आइंस्टीन के सारे प्रोफेसर उनसे काफी परेशान रहते थे।  

इन कारणों से आइंस्टीन कक्षा की जगह लैब में ज्यादा समय अपना  गुजारते थे, वह लैब में अपने  प्रयोग किया करते और कभी – कभी यंत्रो को भी तोड़ दिया करते थे जिससे लैब में भी काफी नुकसान होता था। आइंस्टाइन लगभग सभी की नाक में दम करके रख दिया था । तभी उन्हीं के एक प्रोफेसर ने आइंस्टीन को सबक सिखाने का  सोचा और इस कारण से आइंस्टाइन को अनुशंसा सूची में उन्होंने आइंस्टाइन की बहुत बुराई करी और इस कारण से आइंस्टाइन की कहीं नौकरी नहीं लग सकी आइंस्टाइन कहते हैं कि यदि उन प्रोफेसर ने मेरे साथ यह गंदा खेल नहीं खेला होता  तुम मुझे नौकरी  पाने के लिए इतना परेशान नहीं होना पड़ता।  

 इसी दौरान आइंस्टाइन की पिता की भी तबीयत बहुत खराब होने लगी।  साथ ही उनको नौकरी ना मिलने की वजह से इस समय बहुत कठिनायों  सामना करना पड़ रहा था।  उनको नौकरी ना मिलने पर उन्होंने बच्चों को भी पढ़ाने का कार्य भी किया पर वहा भी असफल रहे।  इस दौरान उनकी पिता की मृत्यु हो गई और आइंस्टाइन इस बात से बहुत ही दुखी थे कि उनके पिता उनको एक असफलता की तौर पर देखते थे और यह बात आइंस्टाइन को आने वाले वक्त में भी काफी सताने वाली थी। कुछ समय बाद उनके पिता के दोस्त की मदद से आइंस्टाइन को एक क्लर्क की नौकरी मिल गई और आइंस्टाइन को काम मिल गया। उनका कार्य एक से ज्यादा घड़ियों के बीच समय के सिग्नल को सही  रखना था।  क्लर्क की नौकरी आइंस्टाइन के लिए सबसे अच्छी चीज थी क्योंकि वह अपना कार्य जल्दी खत्म करके फिजिक्स और  मैथमेटिक्स क्वेश्चन को सॉल्व किया करते थे, जो वह बहुत समय से सोच रहे थे। इसी दौरान आइंस्टाइन ने उस सदी के चार पेपरों को निकाला जिसने फिजिक्स की आने वाली दिशा को ही बदल कर रख दिया और यह साल आइंस्टाइन का मेरे कलियर के नाम से जाना गया।  आइंस्टाइन को  प्रोफेसर के तौर पर यूनिवर्सिटी से लेटर आने लग गए और उनको कई यूनिवर्सिटी में आकर पढ़ाने के लिए भी न्योता दिया गया। आइंस्टाइन का नाम सुर्खियों में छाने लग गया और वह एकाएक प्रसिद्ध हो गए।

इसी दौरान आइंस्टाइन को अपनी पत्नी से भी मुलाकात हुई थी वह उनके साथ पॉलिटेक्निक में पढ़ा किया करते थे। उनका नाम मिलेवा था, आइंस्टाइन के पहले दो बच्चे मिलेवा के साथ हुए परंतु उनकी इतनी कम सैलरी और घर पर ना समय देने के कारण उनकी शादी पर इसका असर देखने को मिल गया।  मिलेवा इस समय बहुत ही परेशान रहा करती थी और इस कारण से आइंस्टाइन घर बहुत कमाया करते थे। 

 इसी दौरान आइंस्टाइन ने अपनी कजिन एल्सा से काफी मिलने लगे और आगे चलकर आइंस्टाइन ने मिलेवा को तलाक दे दिया और अपने कजन एल्सा के साथ शादी कर ली। 

आइंस्टाइन अगले 10 साल तक अपनी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को पूरा करने में बिताते और इसी बीच उनको एक मैथमेटिशियन से भी खतरा था वह आइंस्टाइन की थ्योरी को चुराने की कोशिश करने में थे और वह आइंस्टीन से पहले ही आइंस्टाइन की थ्योरी को मैथमेटिकल मॉडल में कन्वर्ट करके उसको पब्लिश करने की सोच रहे थे। इससे आइंस्टीन बहुत परेशान थे परंतु आइंस्टाइन पहले ही अपनी मॉडल को बनाया और अपनी थिओरी के लिए प्रसिद्ध हो गए। आइंस्टाइन ने अपनी जिंदगी कुछ आखरी साल एक ऐसी थ्योरी को बनाने की कोशिश करी जिससे वह हर प्रकृति की तरंगों को एक में ही बना सके यूनिवर्स यूनिफाइड थ्योरी परंतु आइंस्टाइन यह करने में सक्षम नहीं रहे।  

आइंस्टाइन जोक अपनी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी बना रहे थे तब हिटलर आइंस्टाइन को अपनी थ्योरी की वजह से उनके काफी पीछे पड़ा था और इस कारण से आइंस्टाइन को जर्मनी छोड़कर अमेरिका जाना पड़ा था। 

इसके बाद आइंस्टाइन ने अमेरिका की सिटीजनशिप को घोषित कर लिया और वहां की कॉलेजेस में जाकर पढ़ाने लग गए। आइंस्टीन से कई बार पूछताछ की जाती थी कि कहीं तो वह नाजी पार्टी की कोई सिपाही तो नहीं परंतु यह सब पूछताछ के बाद बहुत ही साफ हो गया था कि आइंस्टाइन जर्मनी छोड़कर आए हैं क्योंकि वह हिटलर से पीछा छोटाना चाहते हैं और उसके जितनी भी दरियादिली काम हो रहे हैं जर्मनी अब सुरक्षित नहीं है। जैसे ही हिटलर अपने ताकत में आ गया था आइंस्टाइन सिटीजनशिप कर चुके थे आइंस्टाइन बताते हैं कि उनको बिल्कुल खराब लगता था जब उनको एक नाजी पार्टी का सिपाही के तौर पर देखते थे।  

 इसके बाद आइंस्टाइन अपनी जिंदगी भर एक ऐसी थोड़ी बनाने की कोशिश करेंगे जो हर तरीके के फील्ड हो कंबाइन करने का कार्य करती परंतु आइंस्टाइन उस समय यह कार्य नहीं कर सके वह यूनिफाइड फील्ड थ्योरी बनाने की कोशिश कर रहे थे। 

इसी के साथ आइंस्टाइन ने क्वांटम मेकैनिक्स में भी काफी अपना हाथ आगे बढ़ाया था और आइंस्टाइन की वजह से कॉन्टम मैकेनिक एक बहुत बड़ी फिजिक्स की नई शाखा बन गई थी। 

आइंस्टाइन को अपने जीवन में कई सारे अवार्ड से सम्मानित किया गया है उनके नाम पर कई यूनिवर्सिटी भी है। 

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