कबीर दास जी की जीवनी इन हिंदी | Biography of Kabirdas in Hindi

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

कबीर दास का नाम संत कबीरदास था। इनका जन्म 1398 लहरतारा ताल, काशी में हुई था। उनके पिता का नाम नीरू तथा माता का नाम नीमा था। उन्ही धर्मपत्नी का नाम लोई तथा बच्चें कमाल एवम् कमाली थे।

शिक्षा:- निरक्षर

इनकी मृत्यु 1518 में मगहर, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

हिन्दी साहित्य के विख्यात व्यक्तित्व कबीर दास जी के के जन्म के बारे में कुछ भी सही प्रमाण नहीं है। कबीर दास जी के माता-पिता के बारे में किसी की भी एक राय नहीं है, फिर भी ऐसा माना जाता है की उनका जन्म 1398 में काशी में हुआ था। कुछ लोगों की माने तो वे एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से स्वामी रामानंद जी महाराज ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था।

जिसके बाद वो ब्राह्मण औरत उस नवजात शिशु को काशी में लहरतारा ताल के पास फेंक आयी थी। जिसके बाद कबीरदास का पालन-पोषण “नीमा’ और “नीरु’ ने किया था बाद में इसी बालक ने महान संत कबीर बनकर भारत की जन्मभूमि को पवित्र कर दिया। कबीर ने खुद को जुलाहे के रुप में पेश किया है।

“जाति जुलाहा नाम कबीरा

बनि बनि फिरो उदासी।”

वहीं अगर कबीर के माननेवालों की माने तो कबीरदास, काशी में लहरतारा तालाब में एक कमल के फूल के ऊपर उत्पन्न हुए थे। इनके मानने वालों  में इनके जन्म के लेकर में यह कथा भी काफी मशहूर है।

चौदह सौ पचपन साल गए,

चन्द्रवार एक ठाठ ठए।

जेठ सुदी बरसायत को

पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥

घन गरजें दामिनि दमके

बूँदे बरषें झर लाग गए।

लहर तलाब में कमल खिले

तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥

 

कबीर दास जी की शिक्षा

माना जाता है कि कबीर दास जी निरक्षर थे। वे पढ़े लिखे नहीं थे लेकन वे अन्य बच्चों से एकदम अलग थे आपको बता दें कि गरीबी की वजह से उनके माता-पिता उन्हें मदरसे नहीं भेज सके। इसलिए कबीरदास जी किताबी विद्या कभी ग्रहण नहीं कर सके।

मसि कागद छूवो नहीं,

क़लम गही नहिं हाथ।

आपको बता दें कि कबीरदास जी ने खुद कोई ग्रंथ या दोहे नहीं लिखे। वे उपदेशों को दोहों को मुंह से बोलते थे जिसके बाद उनके शिष्यों ने उसे लिख कर संग्रहित किया।

कबीर दास पर स्वामी रामानंद का प्रभाव:

कबीर दास के धर्म को लेकर भी कोई पुष्टि नहीं की गई है कहा जाता है कि कबीर जन्म से ही मुसलमान थे। वहीं जब वे स्वामी रामानंद महाराज जी के प्रभाव में आए तब उन्हें हिन्दू धर्म का ज्ञान हुआ था। इसके बाद उन्होनें रामानंद महाराज जी को ही अपना गुरु बना लिया।

कहा जाता है की एक बार कबीरदास पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े थे, उसी समय स्वामी रामानंद जी गंगा स्नान करने के लिए सीढ़ियों पर से उतर रहे थे तभी उनका पैर जाकर कबीर दास जी के शरीर से लगा जिसके बाद कबीरदास के मुंह से ‘राम-राम’ शब्द निकला। फिर क्या था उसी राम को कबीर दास जी ने अपना दीक्षा मंत्र मान लिया और रामानन्द महाराज जी को अपना गुरु स्वीकार लिया। इसके बाद कबीर दास ने एक दोहे में कहा कि,

“हम कासी में प्रकट भये हैं,

रामानन्द चेताये”

संत कबीरदास जी किसी धर्म को नहीं मानते थे बल्कि वे सभी धर्मों की अच्छे विचारों को आत्मसात करते थे। यही वजह है कि कबीरदास जी ने हिंदु-मुसलमान का भेदभाव मिटा कर हिंदू-भक्तों और मुसलमान फक़ीरों के साथ में ही सत्संग किया और उन्होंने दोनों धर्मों से अच्छी विचारों को ग्रहण किया।

आपको बता दें कि कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पंथ के अनुसार कामात्य उनका शिष्य था और कमाली और लोई उनकी शिष्या थी। लोई शब्द का इस्तेमाल कबीर जी ने एक जगह कंबल के रुप में भी किया है। वहीं एक जगह लोई को पुकार कर कबीर ने कहा कि –

“कहत कबीर सुनहु रे लोई

हरि बिन राखन हार न कोई।।”

यह भी माना जाता है कि लोई कबीर जी की पहले पत्नी थी। इसके बाद कबीर जी ने इन्हें शिष्या बना लिया हो। कबीर जी ने अपने दोहे में कहा है कि –

“नारी तो हम भी करी,

पाया नहीं विचार।

जब जानी तब परिहरि,

नारी महा विकार।।”

करीबदास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था। वे अनेकों साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते थे, इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारो और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। कबीर दास जी की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है।

संत कबीर अपनी स्थानीय भाषा में लोगो को समझाते थे और उपदेश देते थे। इसके साथ ही वे जगह-जगह पर उदाहरण देकर अपनी बातों को लोगो के अंतर्मन तक पहुंचाने की कोशिश किया करते थे। कबीर के वाणी को साखी,रमैनी और सबद तीनो रूपों में लिखा गया है। जो ‘बीजक’ के नाम से बहुत प्रसिद्ध है। कबीरदास ग्रन्थावली में भी उनकी रचनाएं का संग्रह देखने को मिलता है। उन्होनें ने गुरु का स्थान भगवान से बढ़कर बताया है। कबीरदास ने एक जगह पर गुरु को कुम्हार का उदाहरण देते हुए समझाया है कि, जो मिट्टी के बर्तन के समान अपने शिष्य को ठोक-पीटकर सुंदर पात्र में परिवर्तित देता है।

कबीर दास हमेशा सत्य बोलने वाले निडर और निर्भीक व्यक्ति थे। वे कटु सत्य भी कहने से नहीं बिल्कुल भी हिचकिचाते और डरते नहीं थे। संत कबीर दास की ये भी एक खासियत थी कि वे निंदा करने वाले लोगों को हमेशा अपना हितैषी मानते थे। कबीरदास को सज्जनों, साधु-संतो की संगति अच्छी लगती थी। कबीर दास जी का कहना था कि –

निंदक नियरे राखिये,

आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना,

निर्मल करे सुभाय।।

वे अपने उपदेशों के माध्यम से समाज में बदलाव करना चाहते थे और समस्त मानव जीवन को सुमार्ग पर चलने की प्रेरणा भी दिया करते थे।

 

कबीर दास के ग्रंथ 

संत कबीरदास के नाम से मिले हुए ग्रंथों की संख्या अलग-अलग लेखों के मुताबिक अलग-अलग पाई गई हैं। एच.एच. विल्सन की माने तो संत कबीरदास जी के नाम पर 8 ग्रंथ हैं। जबकि विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने संत कबीरदास जी के 84 ग्रंथों की लिस्ट जारी की है। रामदास गौड ने हिंदुत्व में कबीरदास की 71 किताबें गिनाईं हैं।

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