जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय [ jaishankar prasad ka jivan parichay ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

जयशंकर प्रसाद हिन्दी जगत के प्रसिद्ध कवि, नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। हिंदी काव्य में जयशंकर प्रसाद ने छायावाद की स्थापना की ।

वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरव करने लायक कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए है; नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे, पाठक आज भी उनके नाटक चाव से पढते हैं। इसके अलावा उन्होंने कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी कई यादगार कृतियाँ दी हैं।

 

प्रारंभिक जीवन

जिस समय खड़ी बोली और आधुनिक हिन्दी साहित्य किशोरावस्था में पदार्पण कर रहे थे उस समय जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 ई.  वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। कवि के दादाजी शिव रत्न साहु वाराणसी के अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिक थे और एक विशेष प्रकार की तंबाकू बनाने के कारण ‘सुँघनी साहु’ के नाम से बहुत प्रख्यात थे। उनकी दानशीलता हर जगह विख्यात थी और उनके यहाँ विद्वानों कलाकारों का बहुत आदर होता था।

इनके पिता देवीप्रसाद साहु ने भी अपने पूर्वजों की परम्परा का पालन किया। इस परिवार की गणना वाराणसी के अतिशय समृद्ध घरानों में से एक थी और धन-वैभव का कभी कोई अभाव न था। माता-पिता ने उनके जन्म के लिए अपने इष्टदेव से बड़ी प्रार्थना की थी। वैद्यनाथ धाम के झारखण्ड से लेकर उज्जयिनी के महाकाल की आराधना के फलस्वरूप पुत्र जन्म स्वीकार कर लेने के कारण शैशव में जयशंकर प्रसाद को ‘झारखण्डी’ कहकर पुकारा जाता था।

इनके बाल्यकाल में ही इनके पिता जी का देहांत हो गया | किशोरावस्था से पूर्व इनकी माता और बड़े भाई का देहांत हो गया | जिसके कारण 17 वर्ष की उम्र में ही जयशंकर प्रसाद पर अनेक जिम्मेदारियां आ गयी | घर में सहारे के रूप में केवल विधवा भाभी और परिवार से सम्बद्ध अन्य लोगों ने इनकी सम्पत्ति हड़पने का षड्यंत्र रचा, परिणाम स्वरुप इन्होंने विद्यालय की शिक्षा छोड़ दी और घर में ही अंग्रेजी, हिन्दी, बंगला, उर्दू, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं का गहन अध्यन किया | ये साहित्यिक प्रवृति के व्यक्ति थे, शिव के उपासक थे और मांस मदिरा से दूर रहते थे | इन्होंने अपने साहित्य साधना से हिन्दी को अनेक उच्चकोटि के ग्रन्थ-रत्न प्रदान किए | इनके गुरुओं में रसमय सिद्ध की भी चर्चा की जाती है | इन्होंने वेद, इतिहास, पुराण व साहित्य का गहन अध्ययन किया था |

इनके नाटकों तथा कहानियो में गृह अंतर्द्वंद्व गहन संवेदना के स्तर पर उपस्थित है। इनकी अधिकांश रचनाएँ इतिहास तथा कल्पना के समन्वय पर आधारित हैं तथा प्रत्येक काल के यथार्थ को गहरे स्तर पर संवेदना की भावभूमि पर प्रस्तुत करती हैं। जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में शिल्प के स्तर पर भी मौलिकता के दर्शन होते हैं। उनकी रचनाओं में भाषा की संस्कृतनिष्ठता तथा प्रांजलता विशिष्ट गुण हैं। चित्रात्मक वस्तु-विवरण से संपृक्त उनकी रचनाएँ प्रसाद की अनुभूति और चिंतन के दर्शन कराती हैं।

जय शंकर प्रसाद छायावादी युग के प्रमुख चार स्तंभों में से एक थे। जो एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात भी थे। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उन्होंने उद्घाटन किया। काव्य साहित्य में कामायनी उनकी बेजोड कृति है । विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन करने वाले इस महामानव ने 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और कई आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं लिख कर हिंदी साहित्य जगत को सजाया सांवरा ।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में कहानीयों को आधुनिक दुनिया की विधा बनाने में जय शंकर प्रसाद का योगदान उल्लेखनीय है। बाहरी घटना को आन्तरिक हलचल के प्रतिफल के रूप में देखने की उनकी दृष्टि, जो उनके निबंधों में शैवाद्वैत के सैद्धांतिक आधार के रूप में है, ने कहानी में आन्तरिकता का आयाम प्रदान किया है। जैनेन्द्र ओर अज्ञेय की कहानियों के मूल में जय शंकर प्रसाद के इस आयाम को देखा जा सकता है।

एक महान लेखक के रूप में विख्यात जयशंकर प्रसाद के तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अभूतपूर्व ऊंचाइयां हैं। उनकी कहानियां कविता समान रहती है। काव्य साहित्य में कामायनी उनकी बेजोड कृति है ।

14 जनवरी 1937 को वाराणसी में निधन, हिंदी साहित्याकास में एक अपूर्णीय क्षति । प्रसाद जी ने अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण चरित्रों को सामने लाते रहे। ’चन्द्रगुप्त’ इनका ऐसा ही एक नाटक है। इस नाटक में भी इन्होंने अपने स्वाभावानुसार सुंदर गीतों का समावेश किया है। इन्हीं में से एक गीत ’हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ में वे बहुत ही सुंदर और ओजस्वी तरीके से भारत के वीरों का आह्वान करते हैं।

 

शैली प्रसाद उर्फ जय शंकर प्रसाद ने निबंध लेखन में निम्नलिखित शैलियों का प्रयोग किया है –

  1. भावात्मक शैली – प्रसाद जी की रचना प्रक्रिया नाटक से काव्य लेखन की ओर अग्रसर हुई है। इसलिए नाटक संयोजन पात्र योजना, भावात्मक, मनोभावों की अभिव्यक्ति भावात्मक शैली में हुई है।
  2. चित्रात्मक शैली – प्रसाद जी ने जहां वस्तुओं, स्थानों और व्यक्तियों के शब्द चित्र में उपस्थित किए हैं वहां उनकी शैली चित्रात्मक होती गई है ।
  3. अलंकारिक शैली- हृदय की प्रधानता के कारण जय शंकर प्रसाद के गद्य में भी अलंकारों का सटीक प्रयोग मिलता है जिसमें सारे अलंकारिक रूप मिलते हैं ।
  4. संवाद शैली – जय शंकर प्रसाद के उपन्यास कहानी और नाटकों में संवाद शैली का प्रयोग पात्र के एकदम अनुकूल किया है ।
  5. वर्णनात्मक शैली – विषय वस्तु का प्रति पादन घटनाओं और वस्तुओं के चित्र में वर्णनात्मक शैली का भी सटीक प्रयोग मिलता है।

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