बाबा कीनाराम की जीवनी [ kinaram baba ki jivani ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

बाबा कीनाराम (जन्म:१६९३-१७६९, काशी) अघोर सम्प्रदाय के अनन्य आचार्य थे। इनका जन्म सन् 1693 के भाद्रपद शुक्ल को चंदौली के रामगढ़ गाँव में अकबर सिंह के घर हुआ। बारह वर्ष की अवस्था में विवाह अवश्य हुआ पर वैराग्य हो जाने के कारण गौना नहीं कराया। ये देश के विभिन्न भागों का भ्रमण करते हुए गिरनार पर्वत पर बस गये। कीनाराम सिद्ध महात्मा थे और इनके जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाएं प्रसिद्ध हैं। सन् १७६९ को काशी में ही इनका निधन हुआ।

बाबा किनाराम एक प्रसिद्ध संत थे, जिंक यश परवर्ती काल में संपूर्ण भारत में फैल गई थी। बनारस के पास चंदौली जिले के ग्राम रामगढ़ में एक कुलीन रघुवंशी क्षत्रिय परिवार में सन् 1601 ई. में इनका जन्म हुआ था। बचपन से ही इनमें आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। तत्कालीन रीति के अनुसार बारह वर्षों के अल्प आयु में, इनकी इच्छा के विरुद्ध इनका विवाह कर दिया गया किंतु दो तीन वर्षों बाद द्विरागमन की पूर्व संध्या को इन्होंने हठपूर्वक माँ से माँगकर दूध-भात खाया। ध्यान देने वाली बात है कि सनातन धर्म में मृतक संस्कार के बाद दूध-भात एक कर्मकांड है। बाबा के दूध-भात खाने के अगले दिन सबेरे ही वधू के देहांत का समाचार आ गया। सभी लोग हैरान थे कि इन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु का पूर्वाभास कैसे हो गया है। अघोर पंथ के ज्वलंत संत के बारे में अनेक कथाएं प्रसिद्ध है,कि एक बार काशी नरेश अपने हाथी पर सवार होकर शिवाला स्थित आश्रम से जा रहे थे,उन्होनें बाबा किनाराम के तरफ तल्खी नजरों से देखा,तत्काल बाबा किनाराम ने आदेश दिया दिवाल चल आगे,इतना कहना कि दिवाल चल दिया और काशी नरेश की हाथी के आगे – आगे चलने लगा। तब काशी नरेश को अपने अभिमान का बोध हो गया और तत्काल बाबा किनाराम जी के चरणों में गिर गये।

काशीनरेश को शाप

तत्कालीन काशीनरेश महाराज चेतसिंह शिवभक्त थे। वे अपने महल में एक शिवालय का निर्माण करा रहे थे। आज उसकी प्राणप्रतिष्ठा थी। सारा राजमहल सजा धजा था। स्वयं महाराज घूम घूम कर सारी व्यवस्था देख रहे थे।

काशी के सभी गणमान्य लोग महल में उपस्थित थे। सारे साधू संत भी बुलाये गए थे। पहरेदारों को सख्त आदेश थे कि कोई अवांछनीय व्यक्ति इस शुभ अवसर पर महल में न आने पाए।

अचानक महाराज चेतसिंह की नजर सामने खड़े एक अस्तव्यस्त वेशभूषा वाले जटाधारी संत पर पड़ी। उसे देखते ही राजा गुस्से में क्रोधित होकर बोले, “इस नरपिशाच को किसने अंदर आने दिया? इसे अभी तुरंत बाहर निकालो।”

यह सुनकर वह सन्यासी भी क्रोधित हो उठे। सन्यासी का मेघगर्जन स्वर पूरे महल में गूंज उठा, “काशीनरेश! तुझे अपनी वीरता और वैभव का बहुत घमंड हो गया है। तूने एक अघोरी बाबा का अपमान किया है। अब शीघ्र ही तेरी वीरता और वैभव दोनों का पतन होना शुरू होगा।”

“जिस किले और महल में तू रह रहा है, यहां पर उल्लू और चमगादड़ निवास करेंगे । कबूतर बीट करेंगे। काशी में मलेक्षों का राज होगा। काशी का राजवंश आज के बाद सदा के लिए संतानहीन होगा। सदा सर्वदा के लिए, यह एक अघोरी का श्राप है।”

यह कहकर वह अघोरी बाबा हवा के झोंके की तरह वहां से गायब हो गए। वह अघोरी कोई और नहीं अघोरेश्वर बाबा कीनाराम महाराज थे। महाराज चेतसिंह के निजी सचिव सदानंद बक्शी जी बाबा कीनाराम की शक्तियों से भलीभांति परिचित थे।

वे बाबा के आश्रम पहुंचे और राजा को क्षमा करने की प्रार्थना की। लेकिन कीनाराम बाबा ने कहा कि अब बात जुबान से निकल चुकी है। यह सत्य होकर रहेगी। तब सदानंद ने कहा, “बाबा! हम लोगों का क्या होगा?”

बाबा ने उत्तर दिया, “जब तक तुम्हारे वंश के लोग अपने नाम के साथ ‘आनंद’ शब्द को लगाते रहेंगे। तब तक तुम्हारा वंश अनादि काल तक चलता रहेगा। कालांतर में उन्हीं के वंशज डॉ0 संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

अब काशीनरेश का हाल सुनिये। थोड़े समय बाद अंग्रेजों ने काशी पर हमला किया। जिसमें महाराज चेत सिंह को शिवाले का किला छोड़ कर भागना पड़ा। काशी पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। वह महल निर्जन और सुनसान हो गया। वहां सचमुच उल्लू और चमगादड़ रहने लगे।

आज भी वहां पक्षियों का ही डेरा है। बाबा कीनाराम के श्राप के अनुसार ही काशी का राजवंश संतान के लिए तरस गया। लगभग 200 वर्षों तक काशी राजवंश गोद ले लेकर चलता रहा।

बाद के राजाओं ने बहुत हवन, अनुष्ठान कराए। सिद्धों, संतों से शापमुक्ति की प्रार्थना की। लेकिन कोई शाप का प्रभाव खत्म नहीं कर पाया। कालांतर में काशी के सर्वाधिक योग्य, जनप्रिय एवं भक्त राजा विभूतिनारायण सिंह ने बाबा कीनाराम के उत्तराधिकारी महासिद्ध अघोरेश्वर भगवान राम के चरणों में बैठकर शापमुक्ति की प्रार्थना की।

द्रवित होकर उन्होंने शाप के प्रभाव को कुछ कम कर दिया और कहा, “इसी गद्दी पर ग्यारहवें उत्तराधिकारी के रूप में स्वयं बाबा कीनाराम 9 वर्ष की अवस्था में आरूढ़ होंगे। जब वे तीस वर्ष के होंगे। तब उनकी कृपा से काशी राजवंश शापमुक्त होगा।

वह दिन 10 फरवरी सन 1978 को आया। जब महाराज बाबा सिद्धार्थ गौतम अघोरपंथ की सर्वोच्च गद्दी पर मात्र 9 वर्ष की अवस्था में विभूषित हुए थे। उसके बाद सन 2000 में काशी राजवंश शापमुक्त हुआ। 200 वर्ष बाद पहली संतान का जन्म हुआ।

कीनाराम बाबा का जन्म सन 1601 में उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद के रामगढ़ नामक गांव में एक कुलीन क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे बहुत आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। खाली समय में वे अपने मित्रों के साथ रामधुन गाते रहते थे।

बारह वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह कर दिया गया और तीन वर्ष बाद गौना निश्चित हुआ। गौने की पूर्वसंध्या पर इन्होंने अपनी माँ से दूध-भात खाने के लिए मांगा। उस समय दूध भात खाना अशुभ माना जाता था।

जोकि मृतक संस्कार के बाद खाया जाता था। माँ के मना करने के बाद भी उन्होंने हठ करके दूध भात खाया। अगले दिन उनकी पत्नी की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ। समाचार से पता चला कि उनकी पत्नी की मृत्यु एक दिन पूर्व सायंकाल में ही हो चुकी थी।

पूरा गांव आश्चर्यचकित था कि घर पर बैठे बैठे कीनाराम को पत्नी की मृत्यु की जानकारी कैसे हो गयी? कुछ समय बाद घरवाले फिर से विवाह के लिए दबाव डालने लगे। जिससे परेशान होकर बाबा कीनाराम ने घर द्वार त्याग दिया।

 

बाबा कीनाराम की जीवनी [ kinaram baba ki jivani ]

बाबा कीनाराम का सन्यासी जीवन

घर छोड़ने के बाद बाबा कीनाराम घूमते हुए गाजीपुर जिले के कारों ग्राम जोकि अब बलिया जिले में अवस्थित है, वहां पहुंचे। वहां रामानुजी परंपरा के संत शिवराम की बड़ी प्रसिद्धि थी। कीनाराम जी उनकी सेवा में जुट गए और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की।

एक दिन शिवराम जी ने इन्हें पूजा सामग्री लेकर गंगातट पर चलने के लिए कहा। कीनाराम जी सामग्री लेकर गंगातट से थोड़ी दूर बैठ गए। थोड़ी देर में गंगा का जल बढ़कर उनके पैरों तक पहुंच गया। यह चमत्कार देखकर शिवरामजी ने इनको दीक्षा दी दी।

बाबा कीनाराम की बीजाराम की मुक्ति

बाबा ने कुछ समय वहां रहकर के साधनाएं कीं। पत्नी की मृत्यु के बाद जब संत शिवराम जी ने पुनर्विवाह किया तो बाबा कीनाराम ने उन्हें छोड़ दिया। भ्रमण करते हुए बाबा नईडीह नामक गांव में पहुंचे। वहां एक बुढ़िया के लड़के को लगान न दे पाने के कारण जमींदार के आदमी पकड़ ले गए थे।

लाचार वृद्धा का दुख बाबाजी से देखा नहीं गया। वे उसके लड़के को छुड़ाने जमींदार के पास पहुंच गए। जमींदार ने कहा कि मेरा लगान दे दीजिए, लड़का ले जाइए। बाबा बोले, “जहां लड़का बैठा है, उसके नीचे खोदो। तुम्हें तुम्हारे लगान से कई गुना अधिक धन मिल जाएगा।

सचमुच वहां सोने की अशर्फियों का ढेर निकला। जमींदार बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गया। लड़के को छोड़ दिया गया। बुढ़िया ने अपने लड़के को बाबा की सेवा में हमेशा के लिए सौंप दिया। वही लड़का आगे चलकर बाबा बीजाराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बाबा कीनाराम  का उत्तराधिकारी बना।

बाबा किनाराम का वैराग्य जीवन

बाबा तो शुरू से ही विरक्त रहते थे, पत्नी के मृत्यु के पश्चात घर से भी निकल पड़े और घूमते-फिरते गाजीपुर जो की अब बलिया में है जिले के कारों ग्राम के पास कामेश्वर धाम में रामानुजी संप्रदाय के संत शिवाराम की सेवा में पहुँचे। कुछ समय बाद दीक्षा देने के पूर्व महात्मा जी ने परीक्षार्थ इनसे स्नान ध्यान के सामान लेकर गंगातट पर चलने को कहा। यह शिवाराम जी की पूजनादि की सामग्री लेकर गंगातट से कुछ दूर पहुँच कर रुक गए तथा गंगाजी को झुककर प्रणाम करने लगे। जब सिर उठाया तब देखा कि भागीरथी का जल बढ़कर इनके चरणों तक पहुँच गया है। इन्होंने इस घटना को गुरु की महिमा मानी। शिवाराम जी दूर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने किशोर किनाराम को असामान्य सिद्ध माना तथा मंत्र दीक्षा दी। जनश्रुतियों के अनुसार कारों के कामेश्वर धाम में साधना के दौरान बाबा किनाराम प्रतिदिन मध्यरात्रि में कारो से पैदल चलकर करीमुद्दीनपुर के कष्टहरणी भवानी मंदिर पहुंचकर दर्शन करते थे और भोर होने से पहले कारो पहुंच जाते थे। बाबा किनाराम को माता कष्टहरणी ने अपने हाथों से प्रसाद देकर सिद्धि प्रदान की थी। पत्नी की मृत्यु के बाद शिवाराम जी ने जब पुनर्विवाह किया तब किनाराम जी ने उन्हें छोड़ दिया।

बाबा किनाराम की गिरनार की यात्रा

औघड़ों द्वारा सर्वाधिक माने जाने वाले स्थल गिरनार पर किनाराम जी को भगवान दत्तात्रेय के स्वयं दर्शन हुए थे जो रुद्र के बाद औघड़पन के द्वितीय प्रतिस्थापक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय के दर्शन गिरनार पर परम सिद्ध औघड़ों को आज भी होता है वर्तमान काल में, किनारामी औघड़पंथी परमसिद्धों की बारहवीं पीढ़ी में, वाराणसीस्थ अघोरेश्वर भगवान राम को भी गिरनार पर्वत पर ही भगवान दत्तात्रेय जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था। गिरनार के बाद किनाराम जी बीजाराम के साथ जूनागढ़ गए। वहाँ भिक्षा माँगने के अपराध में उस समय के नवाब के आदमियों ने बीजाराम को जेल में बंद कर दिया तथा वहाँ रखी 981 चक्कियों में से, जिनमें से अधिकतर पहले से ही बंदी साधु संत चला रहे थे, एक चक्की बीजाराम भी चलाने को दे दिया। किनाराम जी ने सिद्धिबल से यह जान लिया तथा दूसरे दिन स्वयं नगर में जाकर भिक्षा माँगने लगे। सिपाहियों ने उन्हें भी पकड़ कर कारागार में डाल दिया और उन्हें भी चलाने के लिए वही एक चक्की दी गई। बाबा ने बिना हाथ लगाए चक्की से चलने को कहा किंतु यह तो उनकी लीला थी, चक्की नहीं चली। तब उन्होंने पास ही पड़ी एक लकड़ी उठाकर चक्की पर मारी। आश्चर्य कि सब 981 चक्कियाँ अपने आप चलने लगीं। समाचार पाकर नवाब ने बहुत क्षमा माँगी और बाबा के आदेशानुसार यह वचन दिया कि उस दिन से जो भी साधु महात्मा जूनागढ़ आएँगे उन्हें बाबा के नाम पर ढाई पाव आटा रोज दिया जाएगा। नवाब की वंशपरंपरा भी बाबा के आशीर्वाद से ही चली।

बाबा किनाराम अघोरपंथ के साधक

उत्तराखंड हिमालय पर काफी वर्षों तक कठिन तपस्या करने के बाद किनाराम जी बनारस के हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर रहनेवाले औघड़ बाबा कालूराम (यह स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे) के पास पहुँचे। कालूराम जी बड़े प्रेम से दाह किए हुए शवों की बिखरी पड़ी खोपड़ियों को अपने पास बुला-बुलाकर चने खिलाते थे। किनाराम को यह व्यर्थ का खिलवाड़ लगा और उन्होंने अपनी सिद्धि शक्ति से खोपड़ियों का चलना बंद कर दिया। कालूराम ने ध्यान लगाकर समझ लिया कि यह शक्ति केवल किनाराम में है। इन्हें देखकर कालूराम ने कहा-भूख लगी है। मछली खिलाओ। किनाराम ने गंगा तट की ओर मुख कर कहा-गंगिया, ला एक मछली दे जा। एक बड़ी मछली स्वत: पानी से बाहर आ गई। थोड़ी देर बाद कालूराम ने गंगा में बहे जा रहे एक शव को किनाराम को दिखाया। किनाराम ने वहीं से मुर्दे को पुकारा, वह बहता हुआ किनारे आ लगा और उठकर खड़ा हो गया। बाबा किनाराम ने उसे घर वापिस भेज दिया पर उसकी माँ ने उसे बाबा की चरणसेवा के लिए ही छोड़ दिया।

Leave a Comment