महात्मा गांधी का जीवन परिचय पर निबंध [ mahatma gandhi ki jivani in hindi ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी है। इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 में पोरबंदर, काठियावाड़ एजेंसी(गुजरात) में हुआ था।

कार्य/उपलब्धियां : स्वतंत्रता आन्दोलन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक नेता थे। इन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धान्तो पर चलकर हमारे देश को आजाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके इन्ही सब सिद्धांतों ने पूरी दुनिया में लोगों को नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें भारत का राष्ट्रपिता कहा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस ने रंगून रेडियो से वर्ष 1944 में गांधी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ के नाम से सम्बोधित किया था।

महात्मा गाँधी सम्पूर्ण मानव जाति के लिए एक प्रेरणा हैं। उन्होंने हर विपरीत परिस्थिति में भी अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी लोगों से भी इनका पालन करने के लिये कहा। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सदाचार में ही गुजारा। वह सदैव परम्परागत भारतीय पोशाक धोती व सूत से बनी शाल पहना करते थे। सदैव शाकाहारी भोजन खाने वाले इस महापुरुष ने आत्मशुद्धि के लिये कई बार लम्बे उपवास भी रखा करते थे।

1915 में भारत वापस आने से पहले इन्होंने एक प्रवासी वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिये बहुत संघर्ष किया। भारत आकर महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण किया और किसानों, मजदूरों और श्रमिकों को भारी भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये एकजुट किया। 1921 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभाली और अपने कार्यों से देश के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित किया। उन्होंने सन 1930 में नमक सत्याग्रह और इसके बाद 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन से खासी प्रसिद्धि प्राप्त की। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान कई मौकों पर गाँधी जी कई वर्षों तक उन्हें जेल में भी रहे

 

प्रारंभिक जीवन

महात्मा गांधी का जन्म भारत में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। उनके पिता करमचन्द गान्धी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे। मोहनदास की माता पुतलीबाई अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति की थी, जिसका प्रभाव गांधीजी के जीवन में देखने को मिलता है। इन्ही मूल्यों ने आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनकी माता नियमित रूप से व्रत किया करती थीं, और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा करने में दिन-रात एक कर देती थीं।

सन 1883 में साढे 13 साल की उम्र में ही महात्मा गांधी का विवाह 14 साल की कस्तूरबा से करवा दिया गया था। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी प्रथम सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही।

उनकी मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा अल्फ्रेड हाई स्कूल, राजकोट से पूरी हुई थी। शैक्षणिक स्तर पर गांधीजी एक औसत छात्र ही रहे थे। सन 1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से पास की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण वह कभी खुश नही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए।

 

विदेश में शिक्षा और वकालत

मोहनदास करमचंद गांधी अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे, इसलिए उनके परिवार वालों का ऐसा मानना था कि वह अपने पिता और चाचा के उत्तराधिकारी (दीवान) बन सकते थे। उनके एक परिवारक मित्र मावजी दवे साहब ने मोहनदास को ऐसी सलाह दी कि एक बार वो लन्दन से बैरिस्टर की पढ़ाई करके बैरिस्टर बन जाएँ तो उनको आसानी से दीवान की पदवी मिल जाएगी। मोहनदास की माता पुतलीबाई और परिवार के और अन्य सदस्यों ने उनके विदेश जाने के विचार का काफी विरोध किया पर मोहनदास के समझने पर राज़ी हो गए। 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करके बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। अपनी माँ को दिए गए वचन के अनुसार ही उन्होंने लन्दन में अपना समय गुजारा। वहां उन्हें शाकाहारी खाने से सम्बंधित काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, शुरूआती दिनो में कई बार भूखे ही रहना पड़ा। लेकिन बाद में धीरे-धीरे उन्होंने शाकाहारी भोजन वाले रेस्टोरेंट्स के बारे में पता लगाया। इसके बाद उन्होंने ‘वेजीटेरियन सोसाइटी’ की सदस्यता ले ली। इस सोसाइटी के कुछ लोग थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य थे और उन्होंने मोहनदास को भगवद गीता पढने का सुझाव दिया।

1891 में जून में महात्मा गाँधी भारत लौट आए और यहां उन्हें अपनी मां के मौत के बारे में पता चला। उन्होंने बॉम्बे में वकालत शुरु की पर उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। इसके बाद वो राजकोट चले आए और यहाँ उन्होंने जरूरतमन्द लोगों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखना शुरू कर दिया परन्तु कुछ समय बाद उन्होंने यह काम भी छोड़ दिया।

आख़िरकार सन् 1893 में एक भारतीय फर्म से दक्षिण अफ्रीका में एक वर्ष के करार पर वकालत का कार्य  स्वीकार किया।

 

गांधीजी के द्वारा नेतृत्व किए गए आंदोलन एवम् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष (1916-1945)

चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह

खिलाफत आन्दोलन

असहयोग आन्दोलन

स्वराज और नमक सत्याग्रह

हरिजन आंदोलन

भारत छोड़ो आन्दोलन

 

विभाजन एवम् आजादी

द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आज़ाद करने का लिए संकेत दे दिया था। भारत की आजादी के आन्दोलन के साथ-साथ, जिन्ना के नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान बाहुल्य देश’ पाकिस्तान की भी मांग तीव्र कर दी गयी थी और 40 के दशक में इन ताकतों ने एक अलग राष्ट्र  ‘पाकिस्तान’ की मांग को वास्तविकता में बदल दिया था। गाँधी जी देश का बंटवारा तो कभी नहीं चाहते थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के सिद्धांत से बिलकुल अलग था पर ऐसा हो न पाया और अंग्रेजों ने देश को दो टुकड़ों भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर दिया।

 

महात्मा गाँधी की हत्या

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में शाम 5:17 पर नाथूराम गोडसे के द्वारा हत्या कर दी गयी। गाँधी जी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे तभी नाथूराम गोडसे ने उबके सीने में 3 गोलियां दाग दी। ऐसे कहा जाता है की ‘हे राम’ उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे। नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी।

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