माइक टॉयसन की जीवनी – पहला भाग

माइक टॉयसन इतिहास में मुहम्मद अली और शुगर रे जैसे शख्सियत के साथ अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं और बॉक्सिंग के हैविवेट के सबसे कम उम्र के विजेता रहे हैं। जब वह अपने प्रतिद्वंदी को मुक्का मारते थे तो वह एक बार में ही ढेर हो जाते थे इस कारण से माइक टॉयसन को ‘आयरन माइक’ का भी नाम दिया गया है। माइक टॉयसन ने अपनी जिंदगी में कई तकलीफें का सामना किया पर माइक इन तकलीफों से कभी रुके नहीं और अपने आप को बॉक्सिंग में एक लेजेंड साबित कर दिखाया, आइए जानते हैं माइक टायसन की जिंदगी के बारे में और गहराई से। 

 माइकल जेरार्ड टॉयसन का जन्म ब्रोन्सविले, ब्रुकलीन, न्यूयॉर्क में जून ३०, 1966 में हुआ। टॉयसन के असली पिता का नाम परसेल टॉयसन था जो कि जमैका से थे, परंतु टॉयसन के होने से पहले ही उन्होंने टॉयसन की मां को और माइक टॉयसन के जन्म से पहले ही अकेला छोड़ दिया और चले गए। टायसन बताते हैं कि जिन्हें वे अपने पिता के तौर पर मानते थे उनका नाम जिमी किर्कपेट्रिक था। जिमी किर्कपेट्रिक एक बास्केटबॉल प्लेयर थे और उन्हें पत्ते खेलना और सारे जुआ खेलने की आदत थी। 

 टायसन के पिता, जिमी किर्कपेट्रिक ने, जब टायसन 2 वर्ष के थे तो उनकी मां, लोर्ना स्मिथ को बच्चों का ध्यान रखने के लिए अकेला छोड़ कर माइक टायसन को फिर बिना बाप के कर दिया। 

माइक टॉयसन का अपने माँ से भी बहुत ज्यादा अच्छे संबंध नहीं थे। वह बताते हैं इंटरव्यू में की माइक टॉयसन जब वापस घर पर आते थे दिन भर बाहर घूम कर माइक टायसन की माँ उनको उन नए कपड़ों में देखती थी जो उन्होंने माइक टॉयसन  के लिए कभी खरीदे नहीं थे, तब वह समझ जाती थी कि माइक टायसन ने आज फिर कुछ किया है क्योंकि माइक टॉयसन की संगति अच्छी नहीं थी वह हमेशा अपने दोस्तों के साथ रहते थे जो गुंडा गर्दी किया करते थे। इस कारण से माइक टायसन चोरियाँ किया करते। इस कारण से माइक टॉयसन की मां उनसे कभी खुश नहीं रहती थी। वह अपने मां को कभी खुश नहीं कर पाए और यह बात उनको काफी भावुक भी बना देती थी परंतु इस कारण से उनकी बॉक्सिंग पर कभी भी फर्क नहीं पड़ा। 

 माइक टायसन को बचपन में काफी लोगों द्वारा परेशान किया जाता था क्योंकि उनके बोलने का ढंग अलग था। वे तुतला कर बोलते, जिस कारण से दूसरे बच्चे उनका मजाक बनाया करते थे और जब कोई उनके बोलने का मजाक बनाता था तब  माइक टायसन कभी डरते नहीं थे  वे उससे लड़ने के लिए तैयार हो जाते थे और एका एक मुक्के बरसाने लगते।  

माइक टायसन को कबूतरों से बहुत प्रेम था और वह अपने सभी कबूतरों को रोज दाना दिया करते थे। एक दिन एक लड़के ने माइक टायसन के कबूतर को मार दिया तब माइक टायसन ने उस लड़के को छोड़ा नहीं और उसको तब तक मारा जब तक उनके शरीर खून से लथपथ नहीं हो गया था। 

इस कारण से माइक टायसन कई बार जेल जा चुके थे 13 साल की उम्र होने तक उनको 38 इस बार गिरफ्तार हो चुका थे।  

माइक टायसन का कभी स्कूल में मन नहीं लगा उन्होंने बचपन में ही स्कूल जाना छोड़ ही दिया था। 

 ऐसे ही जब एक बार किसी लड़ाई की वजह से माइक टायसन को जुवेनाइल सेंटर पर सजा काटने के लिए भेजा गया। तब वहां के एक ऑफिसर की नजर माइक टायसन पर पड़ी, जुवेनाइल सेंटर के अंदर कई खेलों का इंतजाम किया जाता था कैदियों के बीच बॉक्सिंग भी कराई जाती थी। जब  माइक टायसन की बारी आती थी तब उनका जोरदार मुक्का और उनका गुस्सा देखकर लोग डर जाते थे। इसी चीज को देखकर बॉबी स्टीवर्ट जो वहां के एक ऑफिसर थे ने माइक टायसन को आगे बढ़ाना और बॉक्सिंग में और ट्रेन करने के बारे में फैसला किया। 

 बॉबी स्टीवर्ट ने माइक टायसन  कस डी अमाटो से मिलाया।  कस डी अमाटो एक प्रोफेशनल बॉक्सिंग थे। और यहां से माइक टायसन की बॉक्सिंग की प्रोफेशनल दुनिया में स्वागत हो गया। 

 माइक टायसन जब 16 साल के हुए उनकी मां का देहांत हो गया। क्योंकि माइक टायसन के पास कोई और जगह नहीं थी रहने के लिए और साथ ही साथ वे अब एक अनाथ बच्चे भी हो गए थे इस कारण से  कस डी अमाटो ने उनको अपने घर में लाने का फैसला किया और माइक टायसन को कानूनी रूप से गोद ले लिया। 

जब कस डी अमाटो ने माइक टायसन को ट्रेन करना शुरू किया तो माइक टायसन बॉक्सिंग की कड़ी ट्रेनिंग से बहुत परेशान हो जाते थे और अपने कोच से कहते थे कि वह इतनी कड़ी ट्रेनिंग नहीं कर पाएंगे। कस डी अमाटो ने माइक टायसन के सामने एक शर्त रखी कि यदि वह अगले 1 साल तक जो वह कहते हैं उस प्रकार से ट्रेनिंग करेंगे और उनको अपना सब कुछ दे देंगे ट्रेनिंग में तो वे माइक टायसन को एक प्रोफेशनल चैंपियन में बना देंगे और यदि ऐसा नहीं हुआ तो माइक टायसन को जो अच्छा लगता है वह वह कर सकते थे। 

 माइक टायसन ने इस बात को स्वीकार किया और अपना सब कुछ ट्रेनिंग में लगा दिया धीरे-धीरे उन्होंने दुसरो के साथ बॉक्सिंग करनी शुरू करी और जीतना भी शुरू कर दिया।  कस डी अमाटो  उनके सुबह से लेकर रात तक कोच का कार्य करते थे और उनको यह महसूस हो गया था कि माइक टायसन बहुत ही जल्द विश्व के सबसे अच्छे बॉक्सर में से एक मैं अपना नाम दर्ज कर देंगे। 

 जब माइक टायसन लड़ना शुरू किया तो बहुत ही जल्द विजेता पाना शुरू कर दिया। माइक टायसन के इस शक्ति को देखकर लोग दंग रह जाते थे। जिस शक्ति से वह अपने प्रतिद्वंद्वी को मारते थे और उनके प्रतिद्वंद्वी एक से दो राउंड में ही गिर जाते थे। माइक टायसन माइक टायसन  ने 1981 और 1982 में ओलंपिक गेम्स गोल्ड मेडल गोल्ड जीता जो कॉटेज को 1981 और केल्टन ब्राउन को 1982 में हराकर मिला और ब्राउन ने पहले ही राउंड में अपनी सफेद तोलिया को उड़ा दिया और हार मान ली। 

और इसके बाद माइक टायसन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

माइक टॉयसन की जीवनी – दूसरा भाग

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