परोपकार पर निबंध [ paropkar par nibandh in hindi ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

मनुष्य के मानवता का असली अर्थ परोपकार है। जीवन के विकास के सभी गुणों में यह सबसे अच्छा गुण है। पर+उपकार=परोपकार। यह दो शब्दों का मिलन है। इसका का अर्थ होता है दूसरों का भला करना और दूसरों की सहयता करना। किसी भी व्यक्ति या जानवर की मुसीबत में मदद करना ही परोपकार माना जाता है। हमारे मानव जीवन का यही उद्देशय होना चाहिए की हम किसी भी प्रकार से दूसरों की मदद करे।

ईश्वर ने प्रकृति की रचना द्वारा हमें परोपकार का मूल्य बखूबी समझाया है। पेड़- पौधे  कभी खुद फल नहीं खाते। सूर्य खुद जलकर सम्पूर्ण जगत को प्रकाश देता है। परोपकार से हमारे हृदय को शांति एवम् सुख का अनुभव होता है। मनुष्य के जीवन में परोपकार से बढकर कोई धर्म नहीं है। सभी धर्म परोपकार के आगे तुच्छ जैसे है।

परोपकार व्यक्ति को निस्वार्थ रूप से दूसरे लोगों की सेवा अथवा सहायता करना सिखाता है। परोपकार समाज में प्रेम सन्देश और भाईचारा फैलाता है। एक समृद्ध समाज के लिए हमें परोपकार का महत्व समझना होगा। परोपकारी व्यक्ति को लोगों द्वारा आदर सत्कार मिलता है। दया, प्रेम, अनुराग और करुणा  के मूल में परोपकार की भावना है।

गुरु नानक, शिव, दधीचि, ईसा मसीह, गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू तथा लाल बहादुर शास्त्री जैसे महा पुरुषों ने परोपकार के निमित्त अपनी जिंदगी को कुर्बान कर दिया। परोपकार  की शुरुआत हमेशा घर से होती है क्योंकि जो अपने परिवार से प्यार नहीं कर सकता तो वह व्यक्ति किसी और से कैसे प्यार कर सकता है। हमें अपने बच्चों को बचपन से हो अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए ताकि भविष्य में एक बहेतरीन और स्वच्छ समाज की रचना हो सके।

जीवन विकास के सभी गुणों में सबसे श्रेष्ठ गुण परोपकार है। यह गुण मानवीयता को सुगंधित करता है। परोपकार ही मानव का सबसे बड़ा धर्म है, क्योंकि उनकी महिमा अपरम्पार है। इस गुण की वजह से मानव मानवता के करीब आता है। भगवान ने मनुष्य को विकसित दिमाग के साथ साथ संवेदनशील ह्रदय भी दिया है, जो दूसरे के दुःख दर्द में शामिल होता है। किसी भी पीडि़त  व्यक्ति को संकट से उबारना जैसा कोई नेक और महान कार्य इस पृथ्वी पर नही है। परोपकार को हमारे समाज में अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि इसके द्वारा ही मनुष्य की पहचान होती है।

 

परोपकार का अर्थ

‘पर’ और ‘उपकार’ परोपकार शब्द यह दो शब्दों का समन्वय है। ‘पर’  यानी कि दूसरे लोग। ‘उपकार’ यानी कि  ऐसा कोई काम, जो बिना स्वार्थ के किया गया हो। यह हमें ईश्वर के समीप ले जाता है। परोपकार का दूसरा अर्थ करुणा भी होता है क्योंकि मन में करुणा नहीं हो तो हम किसी पर परोपकार नहीं कर सकते। परोपकार की भावना ही मनुष्यों को पशुओं से अलग करती है।भारत देश की संस्कृति में आपको हर जगह पर कुछ ऐसे किस्से कहानियाँ मिलेंगी, जो यहाँ के लोगों में प्रेम, दया, करूणा और सहणभूति जैसे भावना को बढ़ावा देती हैं।

 

परोपकार का महत्व

जीवन में परोपकार का बहुत महत्व है। मनुष्य एक समाजिक प्राणी है। उन्हें अपने जीवन अस्तित्व के लिए किसी न किसी प्रकार दूसरों पर निर्भय रहना ही पड़ता है। उनके लिए एक दूसरे की मदद के बिना कोई भी कार्य करना संभव नहि है। परोपकार से  विश्व में भाईचारे की भावना बढ़ती है। परोपकार की वजह से मनुष्य स्वार्थहीन बनता है, जो मन को  मन को आंतरिक शांति की ओर ले जाता है। एक स्वस्थ समाज का विकास करने के लिए एक दूसरे के मन में परोपकार की भावना होना आवश्यक है।

भारत की महान विभूतिओं राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम  ने अपने में रहे परोपकार के गुण की वजह से राष्ट्रहित और मानव कल्याण के कई कार्य किये। बिना स्वार्थ के उन्होंने अपना सारा जीवन दूसरों के दुःख और दर्द को मिटाने के लिए समर्पित कर दिया।

 

प्रकृति और परोपकार

ईश्वर हमें प्रकृति द्वारा जीवन विकास के कई गुण सीखना चाहते है इसलिए उन्होंने प्रकृति के कण कण में परोपकार का महत्व समझाया है। प्रकृति के सभी घटक का उनके द्वारा किया गया कर्म सदैव दूसरों के लिए होता है। जैसे कि वृक्ष के ऊपर फल तो होते है लेकिन वो हमेशा दूसरों के लिए ही है । नदियां मनुष्य, पशु पक्षी, और पेड़ पौधों को जीवन देने के लिए निरंतर बहती रहती है। सूर्य हमारे जीवन का एकमात्र स्त्रोत है लेकिन वो हमेशा दूसरों को ऊर्जा देने के लिए खुद जलता है। रात में चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के लिए ही उदित होता है।

गौर से सोंचिये अगर इन सब घटको में से कोई भी एक स्वार्थी बन जाये तो हमारे जीवन का क्या कोई अस्तित्व बचेगा? फिर भी ये बिना स्वार्थ के सदा अपना कार्य करते रहते है। हमारी भारतीय संस्कृति और प्रत्येक धर्म, व्रत हमें यह सिखाते है की हम सीमित साधनों में जीवन बसर करके लोगों के काम आ सके।

प्राचीन सामान्य से परोपकार की गाथा चली आई है। परोपकार के लिए बड़े बड़े ऋषि मुनि और राजाओं ने अपने धन, संपत्ति और किसी ने तो अपने प्राण तक भी त्याग दिए हैं।

 

परोपकार से लाभ

परोपकार से शारीरिक, मानसिक कई लाभ है। अगर हम मन से स्वस्थ रहेंगे तो शारीरिक पीड़ा भी कम होगी। परोपकार हमारे जीवन को प्रसन्नता और संतुष्टि से भर देता है। परोपकार हमारे हृदय और मन को शांति प्रदान करता है। जीवन को आद्यत्मिक उन्नति के और ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण मार्ग परोपकार है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी परोपकार का काफी महिमा बताया गया है। यह पुण्य प्राप्ति का एक मात्र साधन है।

आचार्य चाणक्य परोपकार के बारे में कहा था कि,

‘जिनके हृदय में हमेशा परोपकार  करने की भावना रहती है, उनके समक्ष विपत्तियाँ नहीं फटकती। उन्हें पग-पग पर उन्हें सफलता हाथ लगती है। परोपकारी व्यक्ति  कर्तव्यनिष्ठता और सत्यनिष्ठा के गुणों से भरपूर होता है। परोपकार करने से एक अनोखा आत्मसंतोष मिलता है। साथ साथ समाज में मान प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। पुरे विश्व में उसके यश और कृति के गाने गाये जाते है।’

मनुष्य जीवन ईश्वर का आशीर्वाद है। इसलिए हमें अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग लोगों की सेवा और उनके दुःख दर्द को मिटाने के लिए करना चाहिए। हमें हमारे मित्रों, परिचितों और अपरिचितों के लिए हमेशा परोपकारी की भावना दिखानी चाहिए। अपने सुनहरे और समृद्ध भविष्य के लिए अपने बच्चों को बचपन से ही परोपकार के पाठ सिखाने चाहिए। परोपकार के लिए किये गए कार्य के आनंद की तुलना किसी भी भौतिक सुख से नही की जाती।

जीवन की सार्थकता उसी चीज में है की हम अपना जीवन लोगों की भलाई के लिए समर्पित करें। परोपकार हमें महापुरुषों की श्रेणी में ले आता है।

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