प्रदूषण पर निबंध ( paryavaran pradushan par nibandh )

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

पृथ्वी के सभी जीव अपने जीवन चक्र को चलाने के लिए संतुलित पर्यावरण पर निर्भर करते हैं | संतुलित पर्यावरण से तात्पर्य एक ऐसे  पर्यावरण से है, जिसमें प्रत्येक घटक एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात में उपस्थित होता है | परंतु कभी-कभी मानवीय या अन्य कारणों से पर्यावरण में एक अथवा अनेक घटकों की मात्रा या तो आवश्यकता से बहुत अधिक बढ़ जाती है अथवा पर्यावरण में हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाता है। इस स्थिति में पर्यावरण दूषित हो जाता है तथा जीव समुदाय के लिए किसी न किसी रूप में हानिकारक सिद्ध होता है। पर्यावरण में इस अनचाहे परिवर्तन को ही ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ कहते हैं।

हमारा पर्यावरण धरती पर स्वस्थ जीवन को अस्तित्व में रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिर भी हमारा पर्यावरण दिन-प्रतिदिन मानव निर्मित तकनीक तथा आधुनिक युग के आधुनिकरण के वजह से नष्ट होता जा रहा है। इसलिए आज हम पर्यावरण प्रदूषण जैसे सबसे बड़े समस्या का सामना कर रहे हैं।

सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, भावनात्मक तथा बौद्धिक रूप से पर्यावरण प्रदूषण हमारे दैनिक जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित करता जा रहा है। पर्यावरण प्रदूषण से वातावरण में विभिन्न प्रकार के बीमारीयों का जन्म हो रहा है, जिसे व्यक्ति जीवन भर झेलता रहता है। यह किसी समुदाय या शहर की समस्या नहीं है बल्कि दुनिया भर की समस्या है तथा इस समस्या का समाधान किसी एक व्यक्ति के प्रयास करने से नहीं होगा। अगर इसका निवारण पूर्ण तरीके से नहीं किया गया तो एक दिन पृथ्वी पर जीवन का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। प्रत्येक आम नागरिक को सरकार द्वारा आयोजित पर्यावरण आन्दोलन में शामिल होना चाहिए।

 

प्रदूषक पदार्थ तीन प्रकार के होते हैं

(A) बायोडिग्रेडेबल या जैव निम्नीकरणीयप्रदूषक

जिन प्रदूषक पदार्थ का प्राकृतिक क्रियाओं से अपघटन होकर निम्नीकरण होता है, उन्हें बायोडिग्रेडेबल प्रदूषक कहते हैं। उदाहरणार्थ, घरेलू क्रियाओं से निकले जल-मल का अपघटन सूक्ष्मजीव करते हैं। इसी प्रकार मेटाबोलिक क्रियाओं के उपोत्पाद जैसे CO2 नाइट्रेट्स एवं तापीय प्रदूषण से निकली ऊष्मा आदि का उपचार प्रकृति में ही इस प्रकार से हो जाता है कि उनका प्रभाव प्रदूषक नहीं रह जाता।

(B) नॉन-डिग्रेडेबल या अनिम्नीकरणीय प्रदूषक

ये प्रदूषक पदार्थ होते हैं जिनका प्रकृति में प्राकृतिक विधि से निम्नीकरण नहीं हो सकता। प्लास्टिक पदार्थ, अनेक रसायन, लम्बी शृंखला वाले डिटर्जेन्ट (long chain detergents) काँच, अल्युमिनियम एवं मनुष्य द्वारा निर्मित असंख्य कृत्रिम पदार्थ (synthetic material) इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। इनका हल दो प्रकार से हो सकता है- एक तो इनका पुनः उपयोग अर्थात पुनर्चक्रण (recycling) करने की तकनीकों का विकास तथा दूसरे इनकी अपेक्षा वैकल्पिक डिग्रेडेबल पदार्थों का उपयोग।

(C) विषैले पदार्थ

इस श्रेणी में भारी धातुएँ (पारा, सीसा, कैडमियम आदि) धूमकारी गैसें, रेडियोधर्मी पदार्थ, कीटनाशक एवं ऐसे अनेक कृषि एवं औद्योगिक बहिःस्राव आते हैं जिनकी विषाक्तता के बारे में अभी जानकारी नहीं है। इस श्रेणी के अनेक प्रदूषकों का एक विशेष गुण होता है कि ये आहार-शृंखला में प्रवेश करने के पश्चात हर स्तर पर सांद्रित होते जाते हैं। इस श्रेणी के प्रदूषक वास्तव में मानव एवं अन्य जीवधारियों के स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक हैं।

प्रदूषण के निम्न प्रकार हैं।

ये सभी प्रदूषण प्रदूषक या ध्वनि जैसे अन्य कारणों से उत्पन्न प्रदूषण मुख्य रूप से निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) जल-प्रदूषण

(2) महानगरीय प्रदूषण

(3) वायु- प्रदूषण

(4) रेडियोधर्मी-प्रदूषण

(5) ध्वनि-प्रदूषण

आप सभी ने पाठ्यक्रमानुसार जल, वायु एवं मृदा-प्रदूषण का अवश्य ही अध्ययन किया होगा ।

पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण करना अब बहुत की अधिक आवश्यक हो गया है, जिसके लिए अब वैश्विक स्तर पर भी कदम उठाये जा रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सर्वप्रथम जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना आवश्यक है क्योंकि जितनी अधिक जनसँख्या होगी मानव आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उतनी ही अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग होगा। साथ ही वनों के कटाई पर रोक लगाते हुए वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना चाहिए। आम जनमानस को भी अपने तुच्छ से लाभ के लिए प्राकृति के महत्त्व को नजरअंदाज करते हुए कोई कार्य नहीं करना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित बिन्दु महत्पूर्ण हैं :

➤ वनों की कटाई रोकना चाहिए एवं वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना चाहिए साथ ही वृक्षों की संख्या अधिक होने से होने वाले लाभ के विषय में लोगों को जागरूक करना चाहिए।

➤ खाद्य उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कम करके जैवक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए।

➤ बढ़ती मानव जनसँख्या के नियंत्रण के लिए प्रयास करना चाहिए।

➤ कारखानों के चिमनियों में फ़िल्टर लगाना चाहिए एवं चिमनियों को अधिक ऊंचाई पर रखना चाहिए।

➤ कारखानों द्वारा निकलने वाले जल को कृत्रिम तालाबों में रासायनिक विधि द्वारा उपचारित करने के उपरांत नदियों में छोड़ना चाहिए।

➤ नियंत्रित ध्वनि वाले मशीन उपकरणों के निर्माण एवं उनके ही उपयोग पर जोर देना चाहिए एवं उद्योग धंधों  को हमेशा शहरों या आबादी वाले स्थान से दूर स्थापित करना चाहिए।

➤ परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

➤ हमें सिंगल यूज़ प्लास्टिक एवं अन्य प्लास्टिक के उपयोग को रोकना चाहिए एवं पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए।

➤ घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट का समुचित निस्तारण करना चाहिए।

➤ नवीकरणीय ऊर्जा के श्रोत के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए।

➤ वर्षाजल को संचित करके उसका पुनः उपयोग कर भूमिगत जल को संरक्षित किया जा सकता है।

भौतिकता के इस दौर में मनुष्य निज स्वार्थ के लिए पर्यावरण की अनदेखी करके सम्पूर्ण जीवधारियों के जीवन को खतरे में झोकता जा रहा है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, कल-कारखानों, परमाणु परीक्षणों आदि के कारण आज पूरा पर्यावरण प्रदूषण से ग्रषित है। पर्यावरण की सुरक्षा हम सबकी सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए हमें निःस्वार्थ होकर पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को ख़त्म करने के लिए आगे आना होगा। हमें प्रत्येक कार्य करने से पहले पर्यावरण के अनुकूलता का ध्यान रखना होगा। जब पर्यावरण स्वच्छ रहेगा तभी मनुष्य स्वस्थ्य रहेगा।

Leave a Comment