प्रदूषण पर निबंध हिंदी में ( pradushan par nibandh hindi mein )

अवांछित चीजें जो निकाय के संतुलन के प्रतिकूल हो और उसकी खराब दशा के लिए जिम्मेवार हो वो चीजें प्रदूषक तत्व कहलाते हैं तथा उनके द्वारा विभिन्न प्रकार की उत्पन्न विषम परिस्थितियां प्रदूषण कहलाती है। दूसरे शब्दों में “हमारे द्वारा उत्पन्न वे अपशिष्ट पदार्थ जो पर्यावरण के पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर रहे हैं, प्रदूषक तत्व तथा उनके वातावरण में मिलने से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के संकट की स्थिति प्रदूषण कहलाती है।”

गर्मी की छुट्टियों में जब हम सब अपने दादी-नानी के घर जाते थे, तो हर जगह हरियाली होती थी। हरे-भरे बाग-बगिचों में खेलना कितना अच्छा लगता था। चिड़ियों की चहचहाहट सुनना बहुत प्यारा लगता था। अब वैसा दृश्य कहीं दिखाई नहीं देता है खासकर के शहरों में से ऐसा लगता है मानो ये सब चीजें खत्म ही हो गई है।

आजकल के बच्चों के लिए ऐसे दृश्य केवल पुस्तकों तक ही सीमित रह गया हैं। कभी आपने सोचा है ऐसा आखिर हुआ क्यों? पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य, जल, वायु, आदि सभी जैविक और अजैविक घटक मिलकर इस पर्यावरण का निर्माण करते हैं। सभी जीवों का पर्यावरण में अपना एक विशेष स्थान है।

जब वायु, जल, मृदा आदि में अवांछनीय तत्व घुलकर उसे इतना अधिक गंदा कर देते है कि, यह सब स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालने लगे तो उसे प्रदूषण कहते हैं। प्रदूषण से प्राकृतिक असंतुलन पैदा होती जा रही है। साथ ही यह मानव जीवन के लिए भी बहुत बड़ी खतरे की घंटी है।

हम मनुष्यो की यह जिम्मेवारी बनती है कि हमने और हमारी पूर्व पीढ़ी ने जितनी नासमझी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है, अब उतनी ही समझदारी से प्रदूषण की समस्या को सुलझाने कि कोशीश करें। सर्वप्रथम वनों की अंधाधुंध कटाई सबसे अधिक प्रदूषण के कारको में शामिल है। अधिक से अधिक वृक्षों को लगा कर इस पर बहुत अधिक काबू पाया जा सकता है। इसी तरह कई ऐसे उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर प्रदूषण कम किया जा सकता है।

अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को एक साफ, सुरक्षित और स्वास्थ्य जीवन के साथ साथ स्वच्छ पर्यावरण देना है, तो इस दिशा में हमें कठोर कदम उठाने ही होंगे। और प्रदूषण पर नियंत्रण पाना सिर्फ हमारे देश ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए भी उतना ही आवश्यक है। ताकि सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिक दिनों तक जीवन रह सके।

सर्वप्रथम तो हमें पहले यह जानना जरुरी है कि हमारी किन-किन गतिविधियों के कारण प्रदूषण दिन प्रति दिन बहुत अधिक बढ़ रहा है और पर्यावरण में असंतुलन फैला रहा है।

 

प्रदूषण चार प्रकार के हैं – 

वायु प्रदूषण:

कारखानों के चिमनी से निकलने वाला धुआं और सड़को पर दौड़ते वाहनों से निकलते धुएँ में कार्बन मोनो ऑक्साइड, ग्रीन हाउस गैसें जैसै मिथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन,कार्बन डाई ऑक्साइड आदि खतरनाक गैसें निकलती हैं। ये सभी गैसें वायुमंडल को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। इससे हमारे सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। दमा, टी.बी. इंफ्लूएंजा, डिप्थीरिया, खसरा आदि रोग वायु प्रदूषण का ही कारण हैं।

 

ध्वनि प्रदूषण:

इंसान के सुनने की क्षमता की सीमा होती है, सीमा के ऊपर की सारी ध्वनियां इंसान को बहरा बनाने के लिए काफी हैं। मशीनों की तीव्र आवाज हो या ऑटोमोबाइल्स से निकलती तेज़ आवाज, हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती ही है। इनसे होने वाला प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। इससे पागलपन, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, बहरापन आदि समस्याएं होती है।

 

मृदा प्रदूषण:

खेती में अत्यधिक मात्रा में उर्वरकों और कीट-नाशकों के प्रयोग से मृदा प्रदूषण होता है। साथ ही प्रदूषित मिट्टी में उपजे अन्न खाकर मनुष्यों एवं अन्य जीव-जंतुओं के सेहत पर गलत प्रभाव पड़ता है। इस मिट्टी से सतह पर बहने वाले जल में भी यह प्रदूषण फैल जाता है।

 

प्रदूषण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

 

वनों की अंधाधुंध कटाई:

लगातार दिनों दिन बढ़ती जनसंख्या भी एक महत्वपूर्ण कारण हैं, घर बना कर इंसानों ने बसने के लिए वनों को काटा। पर्यावरण प्रदूषण के पीछे सबसे बड़े कारणों में से एक निर्वनीकरण है। वृक्ष ही वातावरण को शुद्ध करते हैं। वनो के खत्म होने के कारण ही वातावरण में ग्रीन-हाउस गैसों की अधिकता बढ़ती जा रही है। जिसके दुष्परिणाम ग्लोबल-वार्मिग के रूप में हमारे सामने प्रकट हो रही है। क्योंकि पेड़ ही पर्यावरण में मौजूद कार्बन डाइआऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और आक्सीजन का उत्सर्जन वायुमंडल में करते हैं।

 

उद्योग-धंधे:

अमेरिकी कंपनी जो की भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशक रसायन को बनाने के लिए मिक गैस का उत्पादन करती थी। इस कारखाने में 2-3 दिसंबर 1984 को जहरीली मिक गैस (मिथाइल आइसो सायनाइड) के रिसाव के कारण कुछ ही घंटो में करीबन 2500 लोगों ने अपने जान से हाथ धो डाला और हजारों घायल हुए। उस हजारों जानवरो की भी मृत्यु हो गयी थी। इस घटना को भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है।

इस घटना की चर्चा यहाँ इसलिए की गई है, क्योंकि यह औद्योगिकीकरण के कारण हुए प्रदूषण का उदाहरण है। 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में किए गए एटम बम अटैक के कारण हुए भयंकर परिणाम से पूरी दुनिया परिचित है। उसके कारण हुए वायु-प्रदूषण से जापान अभी तक ठीक से उबर नहीं पाया है। आक्रमण के कारण विनाशकारी गैसें सम्पूर्ण वायु-मंडल में फैल गयी थी।

वैज्ञानिकों की मानी जाए तो औद्योगिकीकरण के नाम पर बीते 100 सालों में 36 लाख टन कार्बन डाइआऑक्साइड वायुमंडल में छोड़ी जा चुकी है, जिस कारण हमारी पृथ्वी का तापमान बढ़ा है। और तो और मौसमों में अचानक बदलाव भी इसी कारण हो रही हैं, जैसे अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा, अम्लीय वर्षा, बर्फ का पिघलना, समुद्र के जल-स्तर में वृध्दि होना आदि। अकेले अमेरिका विश्व का लगभग 21% से अधिक कार्बन वायुमंडल में उत्सर्जित करता है।

बढ़ता प्रदूषण आज सम्पूर्ण विश्व का सरदर्द बन चुका है। प्रदूषण के कारण चीजें दिन प्रति दिन बिगड़ती जा रही है। चूँकि सम्पूर्ण विश्व इसके प्रति गंभीर है। लोगों में जागरुकता फैलाने के लिए हर साल पर्यावरण दिवस, जल दिवस, ओजोन दिवस, पृथ्वी दिवस, जैव विविधता दिवस आदि मनाये जाते है। समय-समय पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए स्कॉटहोम सम्मेलन, मॉट्रियल समझौता आदि होता रहा है।

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