प्रेमचंद का जीवन परिचय इन हिंदी [ premchand ki jivani in hindi ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

हमारे बोलचाल के भाषा में प्रयोग की जाने वाली हिन्दी भाषा बेहद खुबसूरत भाषाओं मे से एक है। हिन्दी एक ऐसा विषय है जो, हर किसी को अपना बन लेती है अर्थात्, सरल के लिये बहुत सरल और, कठिन के लिये बेहद कठिन बन जाती है। आज हम बात करने वाले हैं हिन्दी को हर दिन, एक नया रूप, एक नया आयाम, एक नई पहचान देने वाले साहित्यकार एवम् लेखक मुंशी प्रेमचंद जी की, वे एक ऐसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे, जिसने हिन्दी विषय की काया पलट दी।  वे एक ऐसे लेखक थे जो, समय के साथ बदलते गये और, हिन्दी साहित्य को एक आधुनिक रूप प्रदान भी किया। मुंशी प्रेमचंद ने सरल सहज हिन्दी को, ऐसा साहित्य प्रदान किया जिसे हम सभी, कभी नही भूल सकते . बड़ी कठिन परिस्थियों का सामना करते हुए हिन्दी जैसे, खुबसूरत विषय मे, उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मुंशी प्रेमचंद हिन्दी के लेखक ही नही बल्कि, एक महान साहित्यकार, नाटककार, उपन्यासकार जैसी, बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति थे।

 

मुंशी प्रेमचंद जी की जीवनी

मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था जिन्हे आज हम मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानते हैं।

31 जुलाई 1880 को वाराणसी के एक छोटे गाँव लमही मे प्रेमचंद जी का जन्म हुआ था। प्रेमचंद जी एक छोटे और बेहद सामान्य परिवार से थे। उनके दादाजी गुर सहाय राय जी एक पटवारी थे और पिता अजायब राय जी पोस्ट मास्टर थे। बचपन से ही उनका जीवन बहुत ही, संघर्ष में गुजरा था। जब प्रेमचंद जी महज आठ वर्ष की उम्र मे थे तब एक गंभीर बीमारी मे उनकी मां का देहांत हो गया था।

कम उम्र मे ही मां के देहांत होने से, प्रेमचंद जी को, बचपन से ही माता–पिता दोनो का प्यार नही मिल पाया

सरकारी नौकरी के चलते पिताजी का तबादला गोरखपुर में हुआ और फिर कुछ समय बाद पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया। नई मां ने कभी प्रेमचंद जी को पूर्ण रूप से नही अपनाया। उनका बचपन से ही हिन्दी से एक अलग ही लगाव था। जिसके लिये उन्होंने स्वयं ही प्रयास करना प्रारंभ किया और छोटे-छोटे उपन्यास से इसकी शुरूवात की। अपनी रूचि के अनुसार प्रेमचंद जी छोटे-छोटे उपन्यास पढ़ा करते थे। पढ़ने की इसी रूचि के कारण उन्होंने एक पुस्तकों के थोक व्यापारी के पास नौकरी करना शुरू कर दिया।

जिससे वह अपना पूरा दिन पुस्तक पढ़ने के शौक को भी पूरा करते रहे। प्रेमचंद जी बहुत ही सरल और सहज स्वभाव के दयालु प्रवत्ति के व्यक्ति थे। कभी किसी से बिना बात बहस नही करते थे, दुसरो की मदद के लिये सदैव तत्पर रहते थे। ईश्वर के प्रति अपार श्रध्दा भाव रखा करते थे। घर की तंगी को दूर करने के लिये प्रारंभ मे एक वकील के यहा पांच रूपये मासिक वेतन पर नौकरी की। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को हर विषय मे पारंगत कर लिया। जिसका फायदा उन्हें आगे चलकर एक अच्छी नौकरी के रूप मे मिला। प्रेमचंद एक मिशनरी विद्यालय के प्रधानाचार्य के रूप मे नियुक्त किये गये। हर संघर्ष उन्होंने अपना जीवन हँसते-हँसते व्यतीत किया और अंत मे, 8 अक्टूबर 1936 को उनका देहांत हो गया।

 

मुंशी प्रेमचंद की शिक्षा

प्रेमचंद की प्रारम्भिक शिक्षा सात साल की उम्र से अपने ही गाँव लमही के एक छोटे से मदरसा में शुरू हुई थी। मदरसा मे रह कर उन्होंने हिन्दी के साथ उर्दू व थोडा बहुत अंग्रेजी भाषा की भी पढ़ाई की थी।

आगे स्नातक की पढ़ाई के लिये उन्होंने बनारस के एक कालेज मे दाखिला लिया। पैसो की तंगी के कारण उन्हे अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी। बहुत कठिनाई से उन्होंने जैसे-तैसे करके मैट्रिक जी परीक्षा पास की थी। परन्तु उन्होंने जीवन के किसी भी पड़ाव पर हार नही मानी, और 1919 मे फिर से पढ़ाई कर बी.ए की डिग्री लिया।

 

मुंशी प्रेमचंद का विवाह

प्रेमचंद जी बचपन से संघर्ष में जीवन जी रहे थे। कभी उन्हे परिवार का लाड-प्यार और सुख सही से नही मिला। पुराने रीति रिवाजो के कारण पिताजी के दबाव मे आकर करीब पन्द्रह वर्ष की उम्र मे उनका विवाह करवा दिया गया। प्रेमचंद जी का यह विवाह उनकी उनसे बिना पूछे बताए एक ऐसी कन्या से हुआ जिनका स्वभाव बेहद झगड़ालू था। पिताजी ने सिर्फ अमीर परिवार की कन्या को देख कर प्रेमचंद का विवाह करवा दिया था।

थोड़े समय बाद पिताजी की मृत्यु हो गयी। इसके बाद पूरा भार प्रेमचंद जी के कंधो पर ही आ गया। एक समय ऐसा आया कि उन्हें नौकरी के बाद भी जरुरत के लिए अपनी बहुमूल्य वास्तुओ को बेचना पड़ा। बहुत कम उम्र मे गृहस्थी का पूरा बोझ अकेले प्रेमचंद के कंधो पर आ गिरा। इन्ही कारणों से प्रेमचंद की उनकी प्रथम पत्नी से बिल्कुल नही जमती थी, जिसके कारण उन्होंने अपनी प्रथम पत्नी को तलाक दे दिया, और कुछ समय बाद, अपनी पसंद से दूसरा विवाह लगभग पच्चीस साल की उम्र मे एक विधवा स्त्री से किया। प्रेमचंद जी का दूसरा विवाह बहुत ही संपन्न रहा उन्हें इसके बाद उन्हे दिनों दिन तरक्की मिलती ही गई।

 

कार्यशैली

प्रेमचंद जी अपने कार्यो को लेकर, बचपन से ही काफी सक्रीय रहते थे। काफी समस्याओं के बावजूद भी उन्होंने आखरी समय तक हार कभी नही मानी ।और अंतिम क्षण तक वह कुछ ना कुछ करते ही रहे। हिन्दी के साथ-साथ उन्होंने उर्दू मे भी अपनी अमूल्य लेखन दिया।

 

 

प्रेमचंद जी की प्रमुख रचनाएं

ऐसे तो मुंशी प्रेमचंद जी की सभी रचनाये महत्वपूर्ण रही हैं। किसी को भी अलग से,संबोधित नही किया जा सकता और उन्होंने हर तरह की अनेकों मुद्दों पर अनेकों रचनाये लिखी थी जो हम सभी बचपन से हिन्दी मे पढ़ते आ रहे है। ठीक ऐसे ही उनके कई उपन्यास नाटक कविताएँ कहानियाँ और लेख हिन्दी साहित्य मे दिये गये है। जैसे- गोदान, कफन, गबन  आदि अनगिनत रचनाये लिखी है।

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