रतन टाटा की जीवनी – दूसरा भाग

1984 में टाटा ने इंडिका गाड़ी निकली थी। इंडिका चाहे इस समय तो बहुत ही अच्छी कार बन चुकी है क्योंकि उसके काफी अच्छी ज्यादा खूबी है परंतु जिस समय वह लॉन्च करी गई थी तब इंडिका बहुत ज्यादा सफल नहीं हुई थी।  जिसके कारण कंपनी लॉस में आने लग गई थी। रतन टाटा ने इंडिका कार की कंपनी को बेचने की भी कोशिश करी थी जिसके लिए रतन टाटा फोर्ड से भी मिलने गए थे।  रतन टाटा ने फोर्ड से बोला कि आप हमारी कंपनी को खरीद लीजिए तब बिल फोर्ड ने रतन टाटा की काफी अच्छी बेज्जती कर दी, और बिल फोर्ड ने रतन टाटा से कहा कि यदि जब आपको कार्य करने नहीं आता है तो सब गाड़ी बनाना ही क्यों शुरू कर देते हैं और रतन टाटा को यह सब सुनकर बहुत धक्का लग गया और वह अगले दिन ही वापस आ गए और इंडिका गाड़ी को सफल करने में अपना पूरा दिन रात लगा दिया। इसी के कारण रतन टाटा ने अपनी जिंदगी में कोई भी कंपनी नहीं बेची उन्होंने प्रण कर लिया की वह अपनी कोई भी कंपनी किसी को भी नहीं बेचेंगे। 

और कुछ समय बाद जब फोर्ड बिल्कुल ही नुकसान में जा रही थे तब रतन टाटा ने उनकी जैगुआर खरीद कर फोर्ड को यह दिखा दिया था सफलता ही सबसे बड़ा बदला है उसी समय बिल फोर्ड ने रतन टाटा से भी कहा था कि अगर आप यह का खरीदेंगे तो हमारे पर बहुत ही आसान होगा। 

रतन टाटा ने अपने 21 साल के काम के दौरान 50 से भी ज्यादा कंपनियों को संभाले का कार्य किया है और उन्होंने टाटा ग्रुप में 40 से भी ज्यादा गुनाह प्रॉफिट्स को इनक्रीस कर दिया था। 

टाटा ग्रुप के अंदर कई सारी कंपनियां थी जिसके कारण सभी के अलग-अलग चिन्ह हुआ करते थे और रतन टाटा ने कोई मेहनत लगा दी की सभी कंपनियों के सिर्फ एक ही प्रकार के चिन्ह रखे और सभी कंपनियां एक ही  निर्देश के अंदर काम करवा सके । 

 और साथ ही रतन टाटा ने अपने एम्पलॉइस के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट रखा और ऐसी चीजें निर्धारित करें कि जैसे सभी पर लागू होती होगी चाहे वह कोई भी हो  कि चाहे वह बिल्डिंग में एक चाय देने वाला हो या एक बड़े जगह पर कर्मचारी सभी से एक ही तरीके से बात करी जाएगी और सभी को एक ही रूप से देखा जाएगा सभी के साथ एक ही प्रकार का बर्ताव होगा और कई बार ऐसा भी हुआ जितने भी बड़े पोस्ट पर लोग आए थे उन्होंने इस बात को मानने से इनकार  भी किया परंतु रतन टाटा की बात पर बिल्कुल डटे रहे 5 मूल्यों को अपने हर कंपनी में लागू करवा दिया। 

रतन टाटा ने भारतीय जनता के लिए एक ऐसी कार निकालने का फैसला किया जो काफी सस्ती हो और सभी उसे खरीद सके उसी के लिए रतन टाटा ने टाटा नैनो को निकाला जो एक लाख के अंदर खरीदी जा सकती थी और उसके अंदर हर तरीके की सुविधा थी जो एक आम कार के अंदर होती है। परंतु यह उन सभी आम कारों से काफी सस्ती थी जिससे इसे गरीब और मध्यम वर्ग के लोग भी खरीद सकते थे। टाटा नैनो उतना सफल नहीं हो सकी हो जितना रतन टाटा उसे बनाना चाहते थे परंतु एक लाख के अंदर किसी कार को निर्माण करना बिल्कुल भी आम काम नहीं होता है परंतु कार्य रतन टाटा ने कर दिखाया था।  रतन टाटा का हमेशा कार्य 

करने का एक ही उपदेश रहा है वह गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों तक वह सब चीजें पहुंचाने जाते थे जो एक अमीर इंसान महंगे दाम पर उस चीज को खरीद रहा होता था वह हमेशा भारत के लोगों के बारे में सोच कर ही किसी कार्य को शुरू करते थे वे सोचते थे कि मेरे इस कार्य से किस प्रकार से लोगों को फायदा होगा। 

इसी के साथ टाटा ट्रस्ट फाउंडेशन भी रतन टाटा के द्वारा बनाई गई एक ऐसी समिति थी जिसमें यह कार्य संचालित किया करते थे की कंपनी का कुछ पर्सेंट हिस्सा अच्छे कार्यों में और लोकोपकारक जैसे कार्य में लगे। साथ ही रतन टाटा अपने कंपनी का लाभ का बहुत सारा हिस्सा दान कर दिया करते थे। इसी प्रकार जब एक बार केरल में सुनामी आई थी तो रतन टाटा ने उस सुनामी में लोगों की काफी मदद करी थी और उसके बाद 700 घर का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा कराया गया था। 

रतन टाटा ने इसके बाद साइरस मिस्त्री को रतन टाटा संस के चेयरमैन के रूप में 28 दिसंबर 2012 में नियुक्त किया और उन्होंने अपनी गद्दी छोड़ दी और यह टाटा संस में पहली बार हुआ था कि उनके परिवार से ना होकर कोई ऐसा इंसान ने चेयरमैनशिप संभाली थी जो एक टाटा के परिवार से नहीं था। 

साइरस मिस्त्री के द्वारा कुछ ऐसे निर्णय लिए गए जिससे रतन टाटा बिल्कुल खुश नहीं हुए उनके कारण कंपनी को कुछ नुकसान भी काफी बड़ा हो गया था इसके कारण टाटा संस के बोर्ड में साइरस मिस्त्री को उनके चेयरमैनशिप से हटाने का फैसला ले लिया गया। उसके बाद 12 जनवरी 2017 में चंद्रशेखर नत्रजन को नियुक्त किया गया उसके बाद से अभी तक टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर नियुक्त है और अभी भी कार्यरत है। 

रतन टाटा को कई पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है वैसे सबसे बड़े पुरस्कार पद्म भूषण जो 2000 में मिला था और पद्म विभूषण 2008 में जो सर्कार के द्वारा सबसे बड़े नागरिक होने का अवार्ड होता है वह रतन टाटा को दिया गया। 

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