थॉमस अल्वा एडिसन की जीवनी – दूसरा भाग

थॉमस अल्वा एडिसन अपने पेपरों को ग्रेट ट्रंक रेलरोड में बेचा करते थे वह रेलवे स्टेशन पर जाते हैं और वहां पर ट्रेनों के अंदर जाकर यात्रियों को अपने पेपर बांटा करते थे कुछ ही समय के अंदर यात्री को थॉमस अल्वा एडिसन के पेपरों को बहुत ज्यादा पसंद करने शुरू कर दिया और थॉमस अल्वा एडिसन के पेपर काफी अच्छे जितने भी लग गए थे और साथ ही पेपर बेचने के साथ एडिसन ने अपने पैसों को बढ़ाने के लिए चॉकलेट और कैंडी भी बेचना शुरू कर दिया था तो लोग थॉमस अल्वा एडिसन का इंतजार करने के साथ पेपर के साथ चॉकलेट का भी इंतजार करते थे। लोगों द्वारा थॉमस अल्वा एडिसन के पेपरों को काफी पसंद करने जा रहा था।  उन्होंने अगले 4 सालों तक इस कार्य को जारी रखा इसी के साथ थॉमस अल्वा एडिसन ने ट्रेन के अंदर एक बोगी में अपनी एक छोटी सी लैबोरेट्री खोली थी जिसमें वह प्रयोग किया करते थे। 

अपने प्रयोग के दौरान एक बार एडिसन बैटरी के साथ एक्सपेरिमेंट कर रहे थे और उन्हीं के प्रयोग के दौरान लेड एसिड बैटरी जमीन पर गिर गई और कार की बोगी में आग लग गई।  बैटरी के अंदर जो सल्फ्यूरिक एसिड था वह जैसी ही जमीन को अंदर छेद करते हुए बोगी के अंदर एक बहुत बड़ा सा छेद हो गया। जब कंडक्टर बोगी को देखने के लिए आया तो कंडक्टर बहुत ही ज्यादा गुस्सा हो कर रहा हो गया और एडिशन उन्होंने उनके कान के पास एक जोर से तमाचा लगा दिया।  

कुछ लोग कहते हैं की एडिशन की सुनने की क्षमता इसी तमाचे से कम हो गई थी साथ ही कहा जाता है कि एडिशन को अपने बचपन में एक स्कारलेट फीवर हुआ था जिसके कारण एडिशन की सुनने की क्षमता उस फीवर ने ले ली थी और वह बहुत अच्छी तरीके से सुन नहीं पाते थे।  

फिर इसके बाद जो हादसा हुआ जिसमें कंडक्टर ने उनके कान के नीचे बहुत जोर से एक तमाचा लगा दिया उसकी वजह से उन्हें एक कान से सुनना बिल्कुल ही बंद हो गया थी। इसी के साथ एडिशन बताते हैं कि उनको ज्यादा सुन नहीं पाते क्योंकि इस कारण का और फायदा है कि उनका ध्यान इधर-उधर नहीं जाता और ज्यादातर वह अपने कार्य मन में ही कर सकते थे बिना अपने आसपास के सुनाई दिए। अपने कार्य पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते थे अबे कहते थे इसका परिणाम मेरे लिए तो बहुत ही अच्छा रहा। 

परंतु 16 साल के बाद जब एक इतना बड़ा हादसा हो गया तब एडिशन को उस रेलवे स्टेशन से बाहर फेंक दिया गया क्योंकि बिना पूछे एडिसन ने इतनी बड़ी प्रयोगशाला खड़ी कर दी थी एक छोटी सी कार के अंदर और साथ पूरी और जिसमे आग लगा दी थी इस वजह से कंडक्टर बिल्कुल अपना आपा खो दिया और एडिशन को धक्के मार कर बाहर फेंक दिया। 

परंतु एडिशन यहां पर हार नहीं मानी और एडिशन की एक नई जिंदगी की शुरुआत यहीं से होने वाली थी इसके बाद एडिशन जब वह 15 साल के हो गए थे तब तक उन्होंने एक अच्छा टेलीग्राम ऑपरेटर बन गए थे और उन्होंने अपना काम भी शुरू कर दिया था वहां पर एक टेलीग्राफ ऑफिस में एडिसन की नौकरी लगने के पीछे भी एक बहुत बड़ी कहानी है एडिसन जब अपने रेलवे स्टेशन पर अखबार बेचने का कार्य करते थे तब  एडिसन यह देखते हैं कि वह लड़का रेलवे पटरियों के बीच में टहल रहा था और ट्रेन लगभग उसके पास आने वाली थी और वह पटरियों के पीछे खड़ा हुआ था तब एडिशन दौड़ कर जाते हैं और ट्रेन के आने से पहले उस लड़के को पटरियों से हटा देते हैं।  वह बाल-बाल हादसा होने से पहले उस लड़की की जान बचा लेते हैं और जब वह बात उनके पिताजी को पता चलती है जो कि एक टेलीग्राफ ऑफिस में कार्य करते हैं थे तब एडिशन वो कहते हैं मैं तुम्हें एक बहुत ही अच्छा इनाम दूंगा क्योंकि उस समय टेलीग्राफ आया ही हुआ था और टेलीग्राफ हर जगह बहुत तेजी से इस्तेमाल में भी खा रहा था और एडिशन को टेलीग्राफ में काफी दिलचस्पी थी जिसके कारण उनके पिताजी ने कहा कि मैं तुम्हें अपने ऑफिस में कार्य करने की जगह भी दूंगा और साथ ही मैं तुम्हें टेलीग्राफ चलाना भी सिखाऊंगा। फिर इसके बाद क्या था एडिशन 15 साल की उम्र में एक टेलीग्राफ ऑफिस में कार्य करना शुरू कर दिया वहां से उन्होंने टेलीग्राफ के बारे में पढ़ना भी शुरू कर दिया धीरे धीरे थॉमस अल्वा एडिसन इसमें अच्छे होते गए और कुछ समय बाद उन्होंने टेलीग्राफ ऑपरेटर की पद भी अपने हाथ में कर ली।

टेलीग्राफ मशीन पहले के समय के टेलीफोन के बराबर में होती थी और वह काफी लंबी दूरी तक बात करने के लिए कार्य कर सकती थी इससे पहले इतनी लंबी दूरी के लिए किसी इंसान को बात करने के लिए भेजना पड़ता था परंतु जब से टेलीग्राफ आ गया था सब लोगों के संदेश काफी जल्दी पहुँचता था। साथ में किसी की जरूरत भी नहीं होती थी वह संदेश को पहुंचाने के लिए टेलीग्राफ में एक बटन हुआ करता था जिसको बार-बार दबाकर आप अपने सन्देश का निर्माण कर सकते थे परंतु यह आम तरीकों से बहुत अलग था। इसमें आपको संदेश बनाने के लिए अलग प्रकार का कार्य करना पड़ता था और यह मोर्स कोड में तब्दील किया जाता था जो दूसरी जगह पर जाकर हिंदी संदेशों में परिवर्तित हो जाता था। 

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