तुलसीदास का जीवन परिचय इन हिंदी [ tulsidas ki jivani in hindi ]

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

महान कवि तुलसीदास का पूरा नाम गोस्वामी तुलसीदास था। उनकी प्रतिभा-किरणों से न केवल हिन्दू समाज और भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है। इनके जन्म का समय अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाया है।

दंतकथाओं में ऐसा प्रचलित है की जाता एक बार गोस्वामी जी को काशी में रहते हुए अपनी पत्नी की बहुत याद आई, तब व्याकुलता वश वह अपने गुरु से आज्ञा ले कर अपने गाँव राजापुर लौटे थे। और वहीं पास के गांव में अपनी पत्नी के मायके यमुना नदी को तैर कर पार के पहुंचे थे। अपने ससुराल जा कर वह सीधे रात को अपनी पत्नी रत्नावली के कक्ष में ही गए। और उन्हे तभी साथ चलने को कहा। अंधेरी तूफान भरी रात में अपने पति को इस तरह आया देख कर रत्नावली भय और लज्जा से आश्चर्यचकित रह गयी, और उन्होने तुलसीदास को तुरंत वापस जाने को कहा। तुलसीदास के बहुत अधिक आग्रह करने पर रत्नावली ने उन्हे दोहे के माध्यम से शिक्षा दी थी और कहा जाता है के इसी वजह से “तुलसीराम” तुलसीदास बने।

 

तुलसीदास का जीवन परिचय इन हिंदी [ tulsidas ki jivani in hindi ]

तुलसीदास जी का जन्म 

तुलसीदास का जन्म बांदा जिला जो की उत्तर प्रदेश में स्थित है के राजपुर में,13 अगस्त 1532 ईसवी में हुआ था। कई प्रचलित दंतकथाओं के अनुसार उनके पिताजी का नाम आत्माराम शुक्ल दुबे और माता का नाम हुलसी देवी था। तुलसीदास अपने जन्म के समय रोए नहीं थे। 12 महीने के पर पैदा होने के कारण वो सभी बत्तीस दांतों के साथ पैदा हुआ थे। बचपन में उनका नाम रामबोला दुबे था ।

तुलसीदास जी का शुरुआती जीवन

एक पौराणिक कथा के अनुसार तुलसीदास को इस दुनिया में आने में कुल 12 महीने लगे, जो की आम बच्चो के जन्म होने वाले समय से ज्यादा है, तब तक वे अपनी मां के गर्भ में ही रहे। इनके जन्म से 32 दांत थे और वह पांच साल के लड़के की तरह दिखते थे।

अपने जन्म के बाद, वह रोने के बजाय राम के नाम का जाप करने लगा। इसलिए उनका नाम रामबोला रखा गया, उन्होंने स्वयं विनयपत्रिका में कहा है।कई कथाओं में ऐसा बताया जाता है की उनके जन्म के बाद चौथी रात उनके पिता का देहांत हो गया था। तुलसीदास ने अपनी रचनाओं कवितावली और विनयपत्रिका में बताया था कि कैसे उनके माता-पिता ने उनके जन्म के बाद उनका परित्याग कर दिया।

चुनिया (उनकी मां हुलसी की दासी) तुलसीदास को अपने शहर हरिपुर ले गई और उनकी देखभाल की। महज साढ़े पांच साल तक उसकी देखभाल करने के बाद वह मर गई।

उस घटना के बाद, रामबोला एक गरीब अनाथ बच्चे के रूप में रहता थे। वो भिक्षा माँगने के लिए घर-घर जाते थे । यह माना जाता है कि देवी पार्वती ने रामबोला की देखभाल के लिए ब्रह्मण का रूप धारण किया था ।तुलसीदास (गोस्वामी तुलसीदास ) एक हिंदू संत कवि, धर्म सुधारक और दार्शनिक थे। वह रामानंद की गुरु परंपरा में रामानंदी समुदाय के थे । तुलसीदास जन्म से एक सरयूपरिणा ब्राह्मण थे और उन्हें वाल्मीकि का अवतार माना जाता है, जिन्होंने संस्कृत में रामायण की रचना की थी।

वे अपनी मृत्यु तक वाराणसी में रहे। उनके नाम पर तुलसी घाट का नाम रखा गया है। वह हिंदी साहित्य के सबसे महान कवि थे और उन्होंने संकट मोचन मंदिर की स्थापना की ।

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज एक महान हिंदू कवि होने के साथ ही एक संत, एक समाज सुधारक और एक दार्शनिक भी थे जिन्होंने विभिन्न लोकप्रिय पुस्तकों की रचना की है।

उन्हें भगवान राम के प्रति उनकी अथाह भक्ति और महान महाकाव्य, रामचरितमानस के हिंदी लेखक होने के लिए भी याद किया जाता है।

उन्हें हमेशा वाल्मीकि जी (संस्कृत में रामायण के मूल संगीतकार और हनुमान चालीसा) को अवतार के रूप में सराहा गया। गोस्वामी तुलसीदास ने अपना पूरा जीवन बनारस शहर में बिताया और इसी शहर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस भी ली थी।तुलसीदास जी की शिक्षा –

रामबोला जी (तुलसीदास) को विरक्त दीक्षा (वैरागी दीक्षा के रूप में जाना जाता है) दी गई थी और दीक्षा लेने के बाद उन्हें नया नाम तुलसीदास मिला था। उनका उपनयन नरहरिदास द्वारा अयोध्या में किया गया था जब वह केवल 7 वर्ष के थे।

उन्होंने अपनी पहली शिक्षा अयोध्या में शुरू की। उन्होंने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में उल्लेख किया है कि उनके गुरु ने उन्हें बार-बार रामायण सुनाई।

जब वे मात्र 15-16 वर्ष के थे तब वे पवित्र शहर वाराणसी आए और वाराणसी के पंचगंगा घाट पर अपने गुरु शेष सनातन जी से संस्कृत व्याकरण, हिंदू साहित्य और दर्शन, चार वेद, छह वेदांग, ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया था।

अध्ययन के बाद, वे अपने गुरु की अनुमति से अपने जन्मस्थान चित्रकूट वापस आ गए। वह अपने परिवार के घर में रहने लगा और रामायण की कथा सुनाने लगा

तुलसीदास की कविताओं का विषय एक ही स्थान पर केंद्रित है- मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भक्ति। उन्होंने अनेकों रचनाएं लिखीं। उनकी प्रसिद्द रचनाएं हैं- ‘रामचरितमानस’,’रामलला नहछू’, ‘विनयपत्रिका’, ‘जानकी मंगल’, ‘गीतावली’, ‘पारवती मंगल’, ‘बरवै रामायण’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ और ‘वैराग्य संदीपनी’।

तुलसीदास को अवधी और ब्रज दोनों पर समान अधिकार प्राप्त है। ‘रामचरितमानस’ उनकी प्रसिद्धि और लोकप्रियता का आधार है।’विनयपत्रिका’ में उन्होंने अपनी भक्ति भावना को सुमधुर गीतों में प्रस्तुत किया है। उन्होंने ‘रामचरितमानस’ में राम के सम्पूर्ण जीवन की झांकी प्रस्तुत की है।

गोस्वामीजी श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे। इन्होंने वर्तमान समय को देखते हुए लोकभाषा में ‘रामायण’ लिखा। इसमें ब्याज से वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के विधर्मी अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना की गयी है।

तुलसीदास जी के माता-पिता कौन थे?

तुलसीदास के माता पिता के संबंध में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलते है। प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिताजी का नाम आत्माराम दूबे था। किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिताजी का नाम श्रीधर बताया गया है। रहीम के दोहे के आधार पर माता का नाम हुलसी बताया जाता है। अधिकांश विद्वान तुलसीदास का जन्म स्थान राजापुर को मानने के पक्ष में रहते हैं। यद्यपि कुछ विद्वान इसे सोरों शूकरक्षेत्र भी मानते हैं। राजापुर चित्रकूट जिला में एक छोटा सा गाँव है।

वहाँ आत्माराम दुबे नाम के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। संवत् 1589 के श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में इनके यहाँ ही तुलसीदास का जन्म हुआ। प्रचलित कथाओं के अनुसार शिशु बारह महीने तक माँ के गर्भ में रहने के कारण अत्यधिक हृष्ट पुष्ट था और उसके मुख में दाँत जन्म के समय से ही दिखायी दे रहे थे।

जन्म लेने के साथ ही उस शिशु ने सर्वप्रथम राम नाम का उच्चारण किया जिसके कारण उसका नाम रामबोला पड़ गया। उनके जन्म पश्चात दूसरे ही दिन इनकी माता का निधन हो गया। पिता ने किसी और अनिष्टता से बचने के लिये शिशु को चुनियाँ नाम की एक दासी को सौंप दिया और स्वयं विरक्त हो गये।

महादेव की प्रेरणा से रामशैल पर रहनेवाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी जिन्हे नरहरि बाबा कहा जाता है उन्होंने रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीराम रखा। तदुपरान्त वे उस बालक को अयोध्या ले गये और वहाँ संवत् 1561 माघ शुक्ला पञ्चमी को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न कराया। संस्कार के समय भी बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का स्पष्ठ उच्चारण किया, जिसे देखकर लोग चकित रह गये।

इसके बाद नरहरि बाबा ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके बालक को राम-मन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उसे विद्याध्ययन कराया। पिता का नाम पंडित आत्माराम और माता का नाम हुलसी था । इनका बचपन का नाम ‘रामबोला’ था। वंही आश्रम में इनकी शिक्षा होती रही, बाद में इन्होने काशी में शिक्षा ग्रहण की। फिर इनका विवाह रत्नावली के साथ हुआ । वे अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करते थे ।

इसी कारण तुलसीदास जी एक दिन उसके पीछे ससुराल जा पंहुचे। उनको देखकर रत्नावली ने कहा कि जितना प्यार आप इस हाड़-मांस के शरीर से करते हो, इतना प्यार श्री राम से करते तो आपका बेडा पार हो जाता । पत्नी की इन बातों ने जादू सा असर किया और वो घर छोड़कर प्रभु श्रीराम की खोज में तीर्थ स्थानों पर घूमने लगे । एक दिन चित्रकूट में उनको भगवान के दर्शन हो गये ।

तुलसीदास जी के गुरु

तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि महाराज तुलसीदास के गुरु थे। राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।

 

तुलसीदास जी की अहम रचनाएँ

  • मेरे रावरिये गति रघुपति है बलि जाउँ ।
  • देव! दूसरो कौन दीनको दयालु ।
  • हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै ।
  • माधव! मो समान जग माहीं
  • ते नर नरकरूप जीवत जग ।
  • मन माधवको नेकु निहारहि ।
  • सुन मन मूढ:- विनय पत्रिका ।
  • हरि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों
  • लाज न आवत दास कहावत ।
  • मैं केहि कहौ बिपति अति भारी ।
  • केशव,कहि न जाइ:- विनय पत्रिका ।
  • माधव, मोह-पास क्यों छूटै ।
  • यह बिनती रहुबीर गुसाईं ।
  • और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै ।
  • अब लौं नसानी, अब न नसैहों ।
  • मैं हरि, पतित पावन सुने ।
  • मेरो मन हरिजू! हठ न तजै ।
  • जो मन लागै रामचरन अस ।
  • भज मन रामचरन सुखदाई ।
  • मन पछितैहै अवसर बीते।
  • तऊ न मेरे अघ अवगुन गनिहैं ।

 

तुलसीदास जी की मृत्यु कब हुई?

प्रभु की खोज में एक दिन चित्रकूट में उन्हें भगवान के दर्शन हो गये । तुलसीदास की मृत्यु, सवंत 1680 में श्रावण माह कृष्ण तृतीय शनिवार के दिन हुई थी। अपने अंतिम समय में भी तुलसीदास ने राम नाम स्मरण किया था। और ऐसा भी कहा जाता है की तुलसी दास ने अपने मृत्यु से पहले अंतिम कृति विनय-पत्रिका लिखी थी। जिस पर स्वयं प्रभु श्री राम ने हस्ताक्षर किया था। तुलसीदास का जीवन काल 126 वर्ष का रहा था।

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