वर्ण कितने प्रकार के होते हैं | Varn kitne prakar ke hote hain

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

आज का युग अंग्रेजी बोलने का युग है। हर कोई अंग्रेजी बोलने की होड़ में लगा रहता है। उसको सीखने के लिए क्लास भी ज्वाइन करता है। लेकिन हमारी मातृभाषा हिंदी है, उसका अपना अलग ही महत्व है, ये हमारी मातृभाषा है। अगर आप भारत की उच्च परीक्षाएं देना चाहते हैं जैसे की – UPTET, CTET, तो उनके लिए आपकी हिंदी अच्छी होनी बहुत जरुरी है, विशेषकर की हिंदी व्याकरण।

आज हम आपको हिंदी के बहुत महत्वपूर्ण भाग – वर्ण को समझायेंगे। जैसे अंग्रेजी में ABCD होते हैं, वैसे ही हिंदी में वर्ण होते हैं। वर्ण भाषा की वह छोटी इकाई होती है, जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता, आसान शब्दों में अक्षर को ही वर्ण कहा जाता है। आज के इस लेख में हम आपको वर्ण के बारे में बताएँगे।

वर्ण की परिभाषा (Definition of Varn)

वर्ण उस मूल ध्वनि को कहा जाता है, जिसके खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते हैं।

अर्थात , लोगो के द्वारा बताई गई अर्थ से परिपूर्ण ध्वनि को , भाषा (Language) की संज्ञा दी जाए,  और भाषा को चिन्हों के द्वारा लिखी गयी भाषा मे परिवर्तित (Convert) किया जाए, इसी चिन्ह को वर्ण कहा जाता है।

“मौखिक ध्वनियो को व्यक्त करने वाले चिन्हों को वर्ण कहते है।”

वर्णों के व्यक्तित्व समूह को वर्णमाला कहते है। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई होती है। इसके आगे टुकड़े नहीं किये जा सकते है। मूल रूप में वर्ण वे चिन्ह होते है जो हमारे मुख से निकली हुई ध्वनियो के लिखित रूप होते है।

देवनागरी वर्णमाला (Devanagari Varnamala)

देवनागरी वर्णमाला में निम्नलिखित वर्ण है। 

स्वर

अ,  आ, इ,  ई, उ, ऊ,  ऋ, ए, ऐ, ओ,  औ

इन स्वरों को जब व्यंजनों के साथ प्रयुक्त किया जाता है. तो इनके स्थान पर इनके मात्रा – चिन्हों का प्रयोग किया जाता है. ये मात्राए निम्नलिखित है-

अ            आ          इ             ई             उ             ऊ            ऋ           ए            ऐ            ओ          औ

–             ‍‌‌ ‍ा          ि           ी           ु            ू            ृ            े            ै            ो           ौ

अनुस्वार-  अं

विसर्ग-  अः

व्यंजन

क,  ख, ग,  घ, ड. -(क वर्ग)

च,   छ, ज,  झ, ण. -(च वर्ग)

ट,   ठ, ड,  ढ. ण. -(ट वर्ग)

त,  थ, द,  ध, न. -(त वर्ग)

प,  फ, ब,  भ, म. -(प वर्ग)

य,  र, ल, व, स, श, ष, ह

संयुक्त व्यंजन

श्र, त्र, ज्ञ,

हिंदी चिन्ह- हिंदी वर्णमाला में “अ” से “औ” तक ग्यारह स्वर है इनमे “अ” को छोड़कर शेष सभी के लिए मात्रा चिन्ह बनाए गए है क्योकि “अ” स्वर तो प्रत्येक व्यंजन में शामिल ही है.

वर्ण अथवा वर्णमाला भाषा की सबसे छोटी इकाई होती है।

जैसे:- क, ख, व, च, प आदि।

उदाहरण के द्वारा हम मूल ध्वनियों को इस प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं।

जैसे:- काम(क + आ + म + अ) में चार मूल ध्वनियां हैं।

वर्ण कितने प्रकार के होते हैं ? Varn kitne prakar ke hote hain

वर्ण 2 प्रकार के होते हैं।

  • स्वर
  • व्यंजन

स्वर

अंग्रेजी भाषा में जैसे वॉवेल्स होते हैं, वैसे ही यहाँ पर स्वर होते है।

स्वर की परिभाषा: वह वर्ण, जिनके उच्चारण के लिए कोई अन्य वर्ण की सहायता (help) की जरूरत नहीं पड़ती है, उसे स्वर कहते हैं।

जब भी हम स्वर का उच्चारण करते हैं तो हमारे कंठ व तालु का ही उपयोग किया जाता है, जीभ व होंठ का उपयोग नहीं किया जाता (no use of tongue and lips) है।

जैसे:- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः आदि होते हैं।

स्वरों के भेद (Types of Svar)

मुखाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण

अग्र स्वर- जिन स्वरों के उचारण में जीभ के आगे का भाग सक्रिय होता है उन्हें अग्र स्वर कहते है। जैसे-

अ,  आ, इ,  ई, ए, ऐ.

पश्च स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का पिछला हिस्सा सक्रिय होता है। उन्हें पश्च स्वर कहते है। जैसे-

उ,  ऊ, ओ,  औ, आ.

संवृत स्वर- संवृत का अर्थ है कम खुला हुआ, जिन स्वरों के उच्चरण में मुख कम खुले होते हैं, उन्हें संवृत स्वर कहते है जैसे-

ई, ऊ.

अर्द्धसंवृत स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में मुख संवृत स्वर से थोडा अधिक खुलता है, वे अर्द्धसंवृत स्वर कहलाते है. जैसे-

ए, ओ.

विवृत स्वर- विवृत स्वर का अर्थ होता है- अधिक खुला हुआ। जिन स्वरों के उच्चारण में मुख अधिक खुला होता है, वे विवृत स्वर कहलाते है। जैसे-

आ.

अर्द्धविवृत स्वर- विवृत स्वर में थोडा कम और अर्द्धसंवृत से थोडा अधिक मुख खुलने पर इन स्वरों का उच्चारण होता है। उन्हें अर्द्धविवृत स्वर कहते है। जैसे-

ओष्ठ के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण

वृताकार स्वर- इनके उच्चारण में होंठो का आकार गोल हो जाता है जैसे-

उ,  ऊ, ओ, औ

अवृताकार स्वर- इन स्वरों के उच्चारण में होंठ गोल न खुलकर अन्य किसी आकार में खुले, उन्हें अव्रताकार स्वर कहते है। जैसे-

अ,  आ, इ, ई, ए, ऐ

उच्चारण समय के आधार पर स्वरों को 3 भागों में बाटा जा सकता है ।

  • हस्व स्वर
  • दीर्घ स्वर
  • प्लुत स्वर

हस्व स्वर:- काम के समय में बोले जाने वाले शब्दों को हस्व स्वर कहते हैं। जैसे – अ, इ, उ।

दीर्घ स्वर:- इन स्वरों (vowels) का जब हम उच्चारण करते हैं, तो इनमें हस्व स्वर से कही ज्यादा समय का उपयोग होता है, इसलिए इन्हें दीर्घ स्वर कहा जाता है। जैसे– आ, ई,ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, और औ आदि।

प्लुत स्वर:- हस्व स्वर व दीर्घ स्वर से अधिक समय हमे इस स्वर का उच्चारण करने मै लगता है, इसलिए इन्हें प्लुत स्वर कहा जाता है। जैसे – ओउम

व्यंजन

अंग्रेजी में जैसे कॉन्सोनेंट्स होते हैं, वैसे ही यहाँ पर व्यंजन होते हैं।हिन्दी वर्णमाला में मूल विभाजन के आधार पर व्यंजन के पाँच भेद होते हैं स्पर्श व्यंजन, अंतःस्थ व्यंजन, ऊष्म व्यंजन, उच्छिप्त व्यंजन और संयुक्त व्यंजन । व्यंजन के पांचो भेद का विवरण नीचे दिया गया है।

जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हुए हमारी श्वास- वायु मुख के किसी भाग से टकराकर बाहर आती है. उन्हें व्यंजन कहते है। हिंदी वर्ण माला में मूलतः 33 व्यंजन है।

स्वर- तंत्रियो के आधार पर व्यंजन दो प्रकार के है-

अघोष व्यंजन- इन व्यंजनों के उच्चारण के समय स्वर- तंत्रियापरस्पर इतनी दूर हट जाती है की पर्याप्त स्थान के कारण उनके बीच निकलने वाली हवा बिना स्वर तंत्रियो से टकराए और उनमे बिना कम्पन उत्पन्न किए बाहर निकल जाती है इसलिए इन्हें अघोष वर्ण कहते है।

सघोष व्यंजन- उच्चारण के समय दोनों स्वर तंत्रिया इतनी निकट आ जाती है की हवा स्वर तंत्रियो से रगड़ खाती हुई मुख विवर में प्रवेश करती है । स्वर- तंत्रियो के साथ रगड़ खाने से वर्णों में घोषत्व आ जाता है इसलिए इन्हें सघोष वर्ण कहते है।

प्राणत्व के आधार पर व्यंजन दो प्रकार के है-

अल्पप्राण– जिन ध्वनियों के उच्चारण में प्राण अर्थात वायु कम शक्ति से बाहर निकलती है, वे अल्पप्राण कहलाती है।

महाप्राण–  जिन ध्वनियों के उच्चारण में अधिक  प्राण अर्थात वायु अधिक शक्ति से बाहर निकलती है, वे महाप्राण कहलाती है।

व्यंजन के भेद (Types of Vyanjan)

  • स्पर्श व्यंजन
  • अंतःस्थ व्यंजन
  • ऊष्म व्यंजन
  • उच्छिप्त व्यंजन
  • संयुक्त व्यंजन

स्पर्श व्यंजन (Sparsh Vyanjan) – स्पर्श व्यंजन वो होते हैं, जिनका उच्चारण करने पर जीभ मूल्य उच्चारण स्थानों जिनमें कंठ, तालु, दंत, ओष्ठ, मुर्दा हैं, को स्पर्श करती है। इसी के कारण इनका नाम स्पर्श व्यंजन पड़ा है। इन व्यंजनों में, शुरू के 5 वर्ग आने के कारण ये “वर्गीय व्यंजन ” भी कहलाते हैं।

स्पर्श व्यंजनों की संख्या 25 है। इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे:

क वर्ग- क् ख् ग् घ् ड़्

च वर्ग- च् छ् ज् झ् ञ्

ट वर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड़् ढ्)

त वर्ग- त् थ् द् ध् न्

प वर्ग- प् फ् ब् भ् म्

हिंदी भाषा में इन ही वर्णो का उपयोग किया जाता है।

अंतःस्थ व्यंजन (Antahstha Vyanjan) – अन्त:स्थ व्यंजन वो होते हैं , जिन का उच्चारण करते समय हमारी जीभ हमारे मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह नहीं छूती है। अंत: का अर्थ ही होता है – अंदर, इसीलिए जिन का उच्चारण मुंह के भीतर से होता है वे अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं।

अन्त:स्थ व्यंजनों की संख्या चार है। व्यंजन वर्णों में से  य,र,ल,व अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं क्योंकि इन व्यंजनों का उच्चारण मुंह के अंदर से ही किया जाता है, इनका उच्चारण करते समय जीभ मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह touch नहीं करती है।

ऊष्म व्यंजन (Ushm Vyanjan) – ऊष्म व्यंजन वो होते है, जिनका उच्चारण करते समय ऊष्मा यानी गर्मी उत्पन्न होती है । इनका उच्चारण करते समय मुंह से गर्म हवा निकलती है।  उस्मा का मतलब ही होता है गर्मी या गर्माहट। उष्म व्यंजनों की संख्या भी चार होती है। व्यंजन वर्णों में से श,ष,स,ह उष्म व्यंजन कहलाते हैं। यह चारों ऐसे वर्ण है जिनका उच्चारण करते समय हमारे मुंह से निकलने वाली हवा के कारण गर्मी (heat) पैदा होती है।

उच्छिप्त व्यंजन (Uchchhipt Vyanjan) –

इनको द्विगुण व्यंजन (Dwigun Vyanjan) भी कहा जाता है। यह बस दो होते हैं –

ढ़, ड़

संयुक्त व्यंजन (Sanyukt Vyanjan ) – जैसा कि इसके नाम से ही समझ में आ रहा है कि संयुक्त का मतलब होता है – जुड़ना या मिलना, इसीलिए 2 व्यंजनों के मिलने से  बना व्यंजन संयुक्त व्यंजन कहलाता है। संयुक्त व्यंजन में, व्यंजन वर्ण के दो व्यंजन मिलकर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण करते हैं। संयुक्त व्यंजन की संख्या भी चार ही है। क्ष,त्र,ज्ञ, तथा श्र संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं जिसका कारण है की – यह व्यंजन दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं।

हम इसको इस तरह से भी समझ सकते हैं –

क्ष = क् + ष

त्र = त् + र

ज्ञ = ज् + ञ

श्र = श् + र

आशा करते है की इस लेख के माध्यम से आपको वर्ण तथा इनके भेद अच्छे से समझ आ गए होंगे।

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