व्यंजन के कितने भेद होते हैं? | Vyanjan ke kitne bhed hote hain

मेरा नाम रक्षा कुमारी है, मेरा जन्म बिहार के अरवल जिले में हुआ है। मेरी रुचि शुरुआत से ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में रही है।

वैसे अगर देखा जाये, तो आज का युग अंग्रेजी बोलने का युग है। हर कोई अंग्रेजी बोलने (English speaking) की चाहत रखता है, और बोलता भी है। लेकिन हिंदी का अपना अलग ही महत्व है, ये हमारी मात्रा भाषा है। अगर आप भारत की उच्च परीक्षाएं देना चाहते हैं जैसे की – UPTET, CTET, HTET, तो उनके लिए आपकी हिंदी अच्छी होनी बहुत ही जरुरी है, विशेषकर की हिंदी व्याकरण (Hindi grammar)।आज हम आपको हिंदी के बहुत महत्वपूर्ण भाग – व्यंजन (consonant) को समझायेंगे। लेकिन उसको समझने के लिए हमें पहले वर्ण को समझना होगा। जैसे अंग्रेजी में ABCD होते हैं, वैसे ही हिंदी में वर्ण होते हैं। वर्ण भाषा की वह छोटी इकाई होती है, जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता, आसान शब्दों में अक्षर को ही वर्ण कहा जाता है। वर्ण तीन प्रकार के होते हैं – स्वर वर्ण, व्यंजन वर्ण तथा अयोगवाह वर्ण । आज हमें यहां व्यंजन वर्ण के बारे में जानना है। हिंदी भाषा में ३३ व्यंजन होते हैं जैसे की क, ख, ग, घ इत्यादि। इन 33 व्यंजन वर्णों का उपयोग हिंदी भाषा में किया जाता है।

 

व्यंजन की परिभाषा

जिन वर्णों का उच्चारण स्वर (vowels) की सहायता से होता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं।

क, ख, ग, घ, ड. -(क वर्ग)

च, छ, ज, झ, ण. -(च वर्ग)

ट, ठ, ड, ढ. ण. -(ट वर्ग)

त, थ, द, ध, न. -(त वर्ग)प, फ, ब, भ, म. -(प वर्ग)

य, र, ल, व, स, श, ष, ह

संयुक्त व्यंजन- श्र, त्र, ज्ञ,

हिंदी चिन्ह- हिंदी वर्णमाला में “अ” से “औ” तक ग्यारह स्वर होते हैं । इनमे “अ” को छोड़कर शेष सभी के लिए अलग मात्रा चिन्ह बनाए गए है क्योकि “अ” स्वर प्रत्येक व्यंजन में शामिल होता है ।भाषा की सबसे छोटी इकाई को वर्ण अथवा वर्णमाला कहते हैं ।

जैसे:- क, ख, व, च, प आदि।

उदाहरण के द्वारा हम मूल ध्वनियों को इस प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं।

जैसे:- काम(क + आ + म + अ) में चार मूल ध्वनियां हैं।स्वर- तंत्रियो के आधार पर व्यंजन दो प्रकार के है-

अघोष व्यंजन- इन व्यंजनों के उच्चारण के समय स्वर- तंत्रियां परस्पर इतनी दूर हो जाती है की पर्याप्त स्थान के कारण उनके बीच निकलने वाली हवा बिना स्वर तंत्रियो से टकराए और उनमे बिना कम्पन उत्पन्न किए ही बाहर की ओर निकल जाती है। इसलिए इन व्यंजनों को अघोष व्यंजन कहते है।

सघोष व्यंजन- उच्चारण के समय दोनों स्वर तंत्रियोंके परस्पर इतनी निकट आ जाती है की हवा स्वर तंत्रियो से रगड़ खाती हुई मुख विवर में प्रवेश कर जाती है । स्वर तंत्रियो के साथ रगड़ खाने से वर्णों में घोषत्व आ जाता है इसलिए इन्ह व्यंजनों को सघोष व्यंजन कहा जाता है।

प्राणत्व के आधार पर व्यंजन के दो प्रकार के है-

अल्पप्राण व्यंजन – जिन ध्वनियों के उच्चारण में प्राण अर्थात वायु कम शक्ति से बाहर निकलती है, वे अल्पप्राण व्यंजन कहलाती है।

महाप्राण व्यंजन – जिन ध्वनियों के उच्चारण में अधिक प्राण अर्थात वायु अधिक शक्ति से बाहर निकलती है, वे महाप्राण व्यंजन कहलाती है।

 

व्यंजन के कितने भेद होते हैं? | Vyanjan ke kitne bhed hote hain

अब हम आपको व्यंजन के भेदों के बारे में बताते हैं। हिन्दी वर्णमाला में मूल विभाजन के आधार पर व्यंजन के पाँच भेद होते हैं स्पर्श व्यंजन, अंतःस्थ व्यंजन, ऊष्म व्यंजन, उच्छिप्त व्यंजन और संयुक्त व्यंजन । व्यंजन के पांचो भेद का विवरण नीचे दिया गया है।

व्यंजन के निम्नलिखित पाँच भेद होते हैं

  • स्पर्श व्यंजन
  • अंतःस्थ व्यंजन
  • ऊष्म व्यंजन
  • उच्छिप्त व्यंजन
  • संयुक्त व्यंजन

स्पर्श व्यंजन (sparsh vyanjan)

स्पर्श व्यंजन वो होते हैं, जिनका उच्चारण करने पर जीभ मूल्य उच्चारण स्थानों जिनमें कंठ, तालु, दंत, ओष्ठ, मुर्दा हैं, को स्पर्श करती है। इसी वजह से हम इसे स्पर्श व्यंजन कहते है। इन व्यंजनों में, शुरू के ५ वर्ग आने के वजह से यह “वर्गीय व्यंजन ” भी कहलाते हैं। हमारी जुबान जब अलग-अलग आवाज़ निकलने वाली जगह से टकराती है तब यह व्यंजन उत्पन्न होते हैं इसीलिए इन्हें “उदित व्यंजन” भी कहा जाता है।

स्पर्श व्यंजनों की संख्या 25 है। इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे:

क वर्ग- क, ख, ग, घ, डं

च वर्ग– च, छ, ज, झ, ञ

ट वर्ग– ट, ठ, ड, ढ, ण, (ड़ , ढ़)

त वर्ग– त, थ, द, ध, न

प वर्ग- प, फ, ब, भ, म

हिंदी भाषा में इन ही वर्णो का उपयोग किया जाता है।

अंतःस्थ व्यंजन (Antahstha vyanjan)

अन्त:स्थ व्यंजन वो होते हैं , जिन का उच्चारण करते समय हमारी जीभ हमारे मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह नहीं छूती है । अंत: का अर्थ ही होता है – अंदर, इसीलिए जिन का उच्चारण मुंह के भीतर से होता है वे अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं।

अन्त:स्थ व्यंजनों की संख्या चार है। व्यंजन वर्णों में से य,र,ल,व अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं क्योंकि इन व्यंजनों का उच्चारण मुंह के अंदर से ही किया जाता है, इनका उच्चारण करते समय जीभ मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह touch नहीं करती है।

ऊष्म व्यंजन (Ooshm vyanjan)

ऊष्मा व्यंजन वो होते है, जिनका उच्चारण करते समय ऊष्मा यानी गर्मी उत्पन्न होती है । इनका उच्चारण करते समय मुंह से गर्म हवा निकलती है। उस्मा का मतलब ही होता है गर्मी या गर्माहट। उष्म व्यंजनों की संख्या भी चार होती है। व्यंजन वर्णों में से श,ष,स,ह उष्म व्यंजन कहलाते हैं।

उच्छिप्त व्यंजन (Uchchhipt Vyanjan)

इनको द्विगुण व्यंजन (Dwigun Vyanjan) भी कहा जाता है। यह बस दो होते हैं –
ढ़, ड़

संयुक्त व्यंजन (Sanyukt vyanjan)

जैसा कि इसके नाम से ही समझ में आ रहा है कि संयुक्त का मतलब होता है – जुड़ना या मिलना, इसीलिए 2 व्यंजनों के मिलने से बना व्यंजन संयुक्त व्यंजन कहलाता है। संयुक्त व्यंजन में, व्यंजन वर्ण के दो व्यंजन मिलकर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण करते हैं। संयुक्त व्यंजन की संख्या भी चार ही है। क्ष,त्र,ज्ञ, तथा श्र संयुक्त व्यंजन कहते हैं जिसका कारण है की – यह व्यंजन २ व्यंजनों के जुड़ने से बनाता है।

हम इसको इस तरह से भी समझ सकते हैं –

क्ष = क् + ष

यहाँ पर क तथा ष मिलकर क्ष बना रहे हैं, तोह ये संयुक्त व्यंजन है।

त्र = त् + र

यहाँ पर त तथा र मिलकर त्र बना रहे हैं, अतः ये संयुक्त व्यंजन है।

ज्ञ = ज् + ञ

यहाँ पर ज् तथा ञ मिलकर ज्ञ बना रहे हैं तो ये संयुक्त व्यंजन हुआ।

श्र = श् + र

यहाँ पर श् तथा र मिलकर श्र बना रहे हैं, तो ये भी एक संयुक्त व्यंजन हुआ।

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